🔥!!मृत्यु को जीतने वाले शिव!!🔥

परस्पर विरोध के बबीच सामंजस्य का दूसरा नाम शिव है। एक ओर उनके सिर पर परम शीतलकारी चंद्रमा है तो दूसरी ओर उनके गले में विषधर भुजंगों (सांपों) का बसेरा है। एक ओर शिव परम शुद्ध रूप में विराजमान हैं तो दूसरी ओर चिता के भस्म को लपेटने वाले और अपवित्र रहने वाले भी हैं। वे अद्र्घनारीश्वर भी हैं और काम को जीतने वाले भी। वे गृहस्थ जीवन भी जीते हैं और परम वैरागी भी हैं। शिव जब ध्यान लगाते हैं तो पूरा ब्रह्मांड पीछे छूट जाता है। शिव को औघरदानी भी कहा जाता है तो वे संहार के भी देवता हैं। एक ओर शिव संहार के देवता हैं तो दूसरी ओर महामृत्युंजय मंत्र के अधिष्ठाता भी। सब तरह से परिपूर्ण हैं अपने शिव। आइए, इतिहास के प्रारंभ से शिव को जानें। उससे पहले इतिहास के संघर्षों को एक नए नजरिये से देखना आवश्यक है। वेदों के समय में सबसे शक्तिशाली देवता के रूप में प्रतिष्ठापित थे इंद्र। पूरा वेद उनका गुणगान करता है। कइयों को शायद यह मालूम नहीं होगा कि इंद्र विष्णु के बड़े भाई माने जाते हैं। बारिश और मेघों के देवता इंद्र का पूरा जगत सम्मान करता था। उनकी मर्जी के बगैर भूलोक में कहीं कुछ नहीं होता था। इंद्र के पद पर काबिज होने के लिए बराबर देवताओं और असुरों के बीच संग्राम होता रहता था। एक बार भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया। बाल रूप में उन्होंने कई लीलाएं की। वे अपने सखाओं के साथ गौवें चराने जाते थे। उनसे सभी प्रभावित थे। एक बार उन्होंने देखा कि गांव में इंद्र की पूजा की तैयारी की जा रही है। उन्होंने इसका विरोध किया। कहां, यदि पूजा करनी है तो इस गोवद्र्धन पर्वत की करो जिसके कारण हमारी जिंदगी आसान होती है। जिस पर तरह-तरह की वनस्पतियां पनपती हैं। इससे क्रोधित इंद्र ने लगातार तीन दिनों तक भारी बारिश की। लेकिन, कृष्ण ने अपनी सबसे छोटी अंगुली पर गोवद्र्धन पर्वत को उठा कर सबकी रक्षा की। उसी समय से गोवद्र्धन पूजा की परंपरा बन गई। गोवद्र्धन पूजा की परंपरा शुरू होने के बाद संसार में विष्णु का बोलबाला हो गया। चारों ओर विष्णु के मंदिर बनने लगे। विष्णु को लोग अधिक पूजने लगे। लेकिन, इन सबसे इतर एक थे-शिव। पहाड़ पर रहते, भीख मांग कर खाते। जंगलों आदि में घूमते। सांपों, जानवरों, भूत-प्रेतों संग रमते। परम वैरागी। किसी से कोई मतलब नहीं। उन्हें यज्ञ भाग से भी वंचित कर दिया गया। एक बार की बात है कि दक्ष पूरे ब्रह्मांड के अधिपति बनाए गए। उनकी बड़ी पुत्री सती ने पिता की मर्जी के खिलाफ शिव से विवाह किया। दक्ष की बाकी पुत्रियां सुखी-संपन्न घरों में ब्याही गई थीं। एक बार सती ने कैलाश से देखा कि देवता अपने-अपने विमानों में बैठ कर कहीं जा रहे हैं। जब उन्हें यह मालूम चला कि उनके पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में शामिल होने ही देवता जा रहे हैं तो सती भी अपने पिता के घर जाने की जिद करने लगीं। उन्होंने कहा कि मेरे पिता के घर यज्ञ हो रहा है। मुझे अवश्य जाना चाहिए। भगवान शिव ने समझाया कि गुरु, पिता आदि के घर बिना बुलाए भी जाना चाहिए। इस बात में कोई संदेह नहीं है। लेकिन, जहां कोई विरोध करता हो वहां नहीं जाना चाहिए। लेकिन, सती अपनी जिद पर अड़ी रहीं। कहा-कार्य की अधिकता के कारण पिता निमंत्रण देना भूल गए होंगे। लेकिन, हमें वहां अवश्य जाना चाहिए। जब भगवान शिव ने देखा कि सती हठ कर रही हैं तो उन्होंने अपने कुछ गणों के साथ माता सती को यज्ञ में भेज दिया। वहां पहुंचने पर माता सती ने देखा कि यज्ञ में सभी देवी-देवताओं को भाग लिया गया है लेकिन शिव को कोई भाग नहीं दिया गया है। उन्होंने अपने पिता से सवाल किया। लेकिन, दक्ष प्रजापति शिव से रुष्ट थे। इसके पीछे भी एक कारण था। एक बार एक यज्ञ में दक्ष प्रजापति के पहुंचने पर सभी देवता उठ कर खड़े हो गए लेकिन दक्ष के पिता ब्रह्मदेव और भगवान शिव उठ कर नहीं खड़े हुए। दक्ष ने इसे अपना अपमान माना। इस यज्ञ में उन्होंने सती के सामने भगवान शिव को अपशब्द कहना शुरू कर दिया। कहा कि तुम्हें यहां किसने बुलाया है। तुम्हारी बाकी बहनें कितने सुख से जीवन व्यतीत कर रही हैं। एक तुम्हीं हो जिसके शरीर पर नाम मात्र के आभूषण भी नहीं हैं। उस जोगी ने तुम्हें भी जोगन बना दिया है। वह खुद तो भीख मांग कर खाता है और तुम्हें भी खिलाता है। उसे भगवान माना जाता है लेकिन मैं तो उसे देवताओं की श्रेणी में भी नहीं रखता हूं। सती अपने पति का अपमान बर्दाश्त नहीं कर पाईं। उन्होंने कहा कि शिव की निंदा करना और सुनना दोनों महापाप है। लेकिन, मुझे अफसोस है कि मैं आपकी बेटी हूं। इतना कह कर माता सती यज्ञकुंड में कूद गईं। उन्होंने योगाग्नि से अपने शरीर को भस्म कर लिया। माता सती के आत्मदाह करने के बाद शिव के गण क्रोध में यज्ञ स्थल पर तोडफ़ोड़ करने लगे। इधर, दक्ष ने विष्णु और ब्रह्मा से कहा कि उन्होंने उनके यज्ञ की सुरक्षा का वचन दिया था। इसके बाद ब्रह्मा और विष्णु ने दक्ष के यज्ञ की रक्षा के लिए एक अजेय-अमर सेना की रचना कर दी। इस सेना ने शिव के गणों को मार कर भगा दिया। शिव के गण रोते-कलपते कैलाश पर पहुंचे और उन्होंने सारा हाल कह सुनाया। सती के आत्मदाह की खबर सुनते ही शिव क्रोधित हो उठे। उन्होंने क्रोध में अपनी एक जटा उखाड़ी और उसे सामने चट्टान पर दे मारा। भीषण आवाज के साथ उस जटा के दो टुकड़े हो गए। एक टुकड़े से वीरभद्र प्रकट हुए और दूसरे से महाकाली प्रकट हुईं। भगवान शिव से अनुमति पाकर दोनों दक्ष के यज्ञ स्थल की ओर चल पड़े। महाकाली ने पल भर में ही यज्ञ की रक्षा के लिए बनाए गए अमर सैनिकों का नाश कर दिया। सारे देवी-देवता महाकाली के प्रलंयकारी रूप को देख कर भाग खड़े हुए। शिव के अपमान के समय चूषा हंस रहे थे। शिव के गण चण्ड ने चूषा के दांत उखाड़ लिए। वीरभद्र ने यज्ञ का विध्वंस करने के बाद दक्ष प्रजापति का सिर काट दिया। इसके बाद दक्ष प्रजापति के परिजन विलाप करने लगे। उसी समय वहां भगवान शिव प्रकट हुए। दक्ष प्रजापति की पत्नी अर्थाथ अपनी सास की प्रार्थना पर उन्होंने दक्ष प्रजापति के सिर के स्थान पर बकरे का सिर जोड़ कर उन्हें जीवित कर दिया। कहा कि सती का दोबारा जन्म होगा। यदि आप उन्हें पहचान जाएंगे तो आपको इस शाप से मुक्ति मिल जाएगी। इसके बाद माता सती के शव को कंधे पर रख कर शिव पागलों पर तरह संसार में इधर-उधर भटकने लगे। यह देख कर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को काटना शुरू किया। माता सती के शरीर के 108 टुकड़े हो गए। ये टुकड़े जहां-जहां गिरे, वे जगह शक्तिपीठ कहलाए। देवी भागवत में व्यास जी ने 109 शक्तिपीठों का वर्णन किया है। उनके नाम इस प्रकार हैं-
1. वाराणसी में देवी विशालाक्षी।
2. नैमिषारण्य क्षेत्र में देवी लिंग्धारिणी।
3. प्रयाग में देवी ललिता।
4. गंधमादन पर्वत पर देवी कामुकी।
5. दक्षिण मानसरोवर में देवी कुमुदा।
6. उत्तर मानसरोवर में, सर्व कामना पूर्ण करने वाली देवी विश्वकामा।
7. गोमान्त पर देवी गोमती।
8. मंदराचल पर देवी कामचारिणी।
9. चैत्ररथ में देवी मदोत्कता।
10. हस्तिनापुर में देवी जयंती।
11. कन्याकुब्ज में देवी गौरी।
12. मलयाचल पर देवी रम्भा।
13. एकाम्र पीठ पर देवी कीर्तिमती।
14. विश्वपीठ पर देवी विश्वेश्वरी।
15. पुष्कर में देवी पुरुहूता।
16. केदार स्थल पर देवी सन्मार्गदायनी।
17. हिमात्वपीठ पर देवी मंदा।
18. गोकर्ण में देवी भद्र कर्णिका।
19. स्थानेश्वर में देवी भवानी।
20. बिल्वक में देवी बिल्वपत्रिका।
21. श्रीशैलम में देवी माधवी।
22. भाद्रेश्वर में देवी भद्र।
23. वरह्पर्वत पर देवी जया।
24. कमलालय में देवी कमला।
25. रुद्रकोटि में देवी रुद्राणी।
26. कालंजर में देवी काली।
27. शालग्राम में देवी महादेवी।
28. शिवलिंग में देवी जलप्रिया।
29. महालिंग में देवी कपिला।
30. माकोट में देवी मुकुटेश्वरी।
31. मायापुरी में देवी कुमारी।
32. संतानपीठ में देवी ललिताम्बिका।
33. गया में देवी मंगला।
34. पुरुषोतम क्षेत्र में देवी विमला।
35. सहस्त्राक्ष में देवी उत्पलाक्षी।
36.हिरण्याक्ष में देवी महोत्पला।
37. विपाशा में देवी अमोघाक्षी।
38. पुंड्रवर्धन में देवी पाडला।
39. सुपर्श्व में देवी नारायणी।
40. चित्रकूट में देवी रुद्रसुन्दारी।
41. विपुल क्षेत्र में देवी विपुला।
42. मलयाचल में देवी कल्याणी।
43. सह्याद्र पर्वत पर देवी एकवीर।
44. हरिश्चंद्र में चन्द्रिका।
45. रामतीर्थ में देवी रमण।
46. यमुना में देवी मृगावती।
47. कोटितीर्थ में देवी कोटवी।
48. माधव वन में देवी सुगंधा।
49. गोदावरी में देवी त्रिसंध्या।
50. गंगाद्वार में देवी रतिप्रिया।
51. शिवकुंड में देवी सुभानंदा।
52. देविका तट पर देवी नंदिनी।
53. द्वारका में देवी रुकमनी।
54. वृन्दावन में देवी राधा।
55. मथुरा में देवी देवकी।
56. पाताल में देवी परमेश्वरी।
57. चित्रकूट में देवी सीता।
58. विन्ध्याचल पर देवी विध्यवासिनी।
59. करवीर क्षेत्र में देवी महालक्ष्मी।
60. विनायक क्षेत्र में देवी उमा।
61. वैद्यनाथ धाम में देवी आरोग्य।
62. महाकाल में देवी माहेश्वरी।
63. उष्ण तीर्थ में देवी अभ्या।
64. विन्ध्य पर्वत पर देवी नितम्बा।
65. माण्डवय क्षेत्र में देवी मांडवी।
66. माहेश्वरी पुर में देवी स्वाहा।
67. छगलंड में देवी प्रचंडा।
68. अमरकंटक में देवी चंडिका।
69. सोमेश्वर में देवी वरारोह।
70. प्रभास क्षेत्र में देवी पुष्करावती।
71. सरस्वती तीर्थ में देव माता।
72. समुद्र तट पर देवी पारावारा।
73. महालय में देवी महाभागा।
74. पयोष्णी में देवी पिन्गलेश्वरी।
75. कृतसौच क्षेत्र में देवी सिंहिका।
76. कार्तिक क्षेत्र में देवी अतिशंकारी।
77. उत्पलावर्तक में देवी लोला।
78. सोनभद्र नदी के संगम पर देवी सुभद्रा।
79. सिद्ध वन में माता लक्ष्मी।
80. भारताश्रम तीर्थ में देवी अनंगा।
81. जालंधर पर्वत पर देवी विश्वमुखी।
82. किष्किन्धा पर्वत पर देवी तारा।
83. देवदारु वन में देवी पुष्टि।
84. कश्मीर में देवी मेधा।
85. हिमाद्री पर्वत पर देवी भीमा।
86. विश्वेश्वर क्षेत्र में देवी तुष्टि।
87. कपालमोचन तीर्थ पर देवी सुद्धि।
88. कामावरोहन तीर्थ पर देवी माता।
89. शंखोद्धार तीर्थ में देवी धारा।
90. पिंडारक तीर्थ पर धृति।
91. चंद्रभागा नदी के तट पर देवी कला।
92. अच्छोद क्षेत्र में देवी शिवधारिणी।
93. वेण नदी के तट पर देवी अमृता।
94. बद्रीवन में देवी उर्वशी।
95. उत्तर कुरु प्रदेश में देवी औषधि।
96. कुशद्वीप में देवी कुशोदका।
97. हेमकूट पर्वत पर देवी मन्मथा।
98. कुमुदवन में सत्यवादिनी।
99. अस्वथ तीर्थ में देवी वन्दनीया।
100. वैश्वनालय क्षेत्र में देवी निधि।
101. वेदवदन तीर्थ में देवी गायत्री।
102. भगवान् शिव के सानिध्य में देवी पार्वती।
103. देवलोक में देवी इन्द्राणी।
104. ब्रह्मा के मुख में देवी सरस्वती।
105. सूर्य के बिम्ब में देवी प्रभा।
106. मातृकाओ में देवी वैष्णवी।
107. सतियो में देवी अरुंधती।
108. अप्सराओ में देवी तिलोत्तमा।
109. शरीर धारिओ के शरीर में या चित में ब्रह्मकला।
इसके बाद भगवान शिव अपनी चिर-परिचित समाधि में लीन हो गए। उनके समाधि में लीन होने से सृष्टि का क्रम गड़बड़ाने लगा। वे फिर से वैरागी बन गए थे। संसार से उनका मन उचट गया था। इधर तारकासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर का प्रादुर्भाव हुआ। उसने शिव को चिर समाधि में लीन देख कर ब्रह्मा से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि शिव पुत्र को छोड़ कर कोई उसका अंत नहीं कर सके। अगली पोस्ट में हम आपको मां पार्वती के जन्म, जन्म के समय हुईं गोपनीय घटनाओं और शिव पार्वती के विवाह के अलावा तारक वध की कथा बताएंगे।


🦜स्वामी श्री हरिदास राधेशनन्दन जू🦜

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