मेधाजनन सूक्त (अथर्ववेद)

ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः । वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे ॥१॥

ये जो त्रिसप्त (तीन एवं सात के संयोगी विश्व के सभी रूपों को धारण करके सब ओर संव्याप्त-गतिशील हैं, हे वाचस्पते ! आप उनके शरीरस्थ बल को आज हमें प्रदान करें ॥१॥

1. Now may Vāchaspati assign to me the strength and powers of Those Who, wearing every shape and form, the triple seven, are wandering round.



पुनरेहि वचस्पते देवेन मनसा सह । वसोष्पते नि रमय मय्येवास्तु मयि श्रुतम् ॥२॥

हे वाचस्पते ! आप दिव्यप्रकाशित) ज्ञान से युक्त होकर, बारम्बार हमारे सम्मुख आएँ । हे वसोष्पते । आप हमें प्रफुल्लित करें । प्राप्त ज्ञान हममें स्थिर रहे ॥२॥

2. Come thou again, Vāchaspati, come with divine intelligence. Vasoshpati, repose thou here. In me be Knowledge, yea, in me.



इहैवाभि वि तनूभे आर्त्नी इव ज्यया । वाचस्पतिर्नि यछतु मय्येवास्तु मयि श्रुतम् ॥३॥

हे देव ! धनुष की चढ़ी हुई प्रत्यञ्चा से खिंचे हुए दोनों छोरों के समान दैवी ज्ञान धारण करने में समर्थ, मेधा बुद्धि एवं वांछित साधन-सामग्री आप हमें प्रदान करें । प्राप्त बुद्धि और वैभव हममें पूरी तरह स्थिर रहें ॥३॥

3. Here, even here, spread sheltering arms like the two bow-ends strained with cord. This let Vāchaspati confirm. In me be Knowledge, yea, in me.



उपहूतो वाचस्पतिरुपास्मान् वाचस्पतिर्ह्वयताम् । सं श्रुतेन गमेमहि मा श्रुतेन वि राधिषि ॥४॥

हे वाचस्पते ! आप हमें अपने पास बुलाएँ। इस निमित्त हम आपका आवाहन करते हैं। हमें सदैव आपका सान्निध्य प्राप्त हो । हुम कभी भी ज्ञान से विमुख न हों ॥४॥

4. Vāchaspati hath been invoked: may he invite us in reply. May we adhere to Sacred Lore. Never may I be reft thereof.


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