✔✔हरड़ के गुण और उससे होने वाले आयुर्वेदिक इलाज

घरेलू आयुर्वेदिक उपचार💊💉*
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✔✔हरड़ के गुण और उससे होने वाले आयुर्वेदिक इलाज

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परिचय

हरड़ का पेड़ पूरे भारत में पाया जाता है। आमतौर पर इसका पेड़ 18 से 24 मीटर तक ऊंचा होता है। कहीं-कहीं पर इसके पेड़ 30 मीटर तक ऊंचे होते हैं। इसका तना मजबूत, लंबा, सीधा और छाल मटमैली होती है। इसके पत्ते 3 से 8 इंच लंबे और लगभग 2 इंच चौड़े अड़ूसा के पत्तों के समान होते हैं। हरड़ को संस्कृत में कई नामों से जाना जाता हैं। जैसे हरीतकी, अभया, शक्तस्राश्टा, अमृता, नन्दिनी, रोहिणी, जीवन्ती, श्रेयसी, गिरिजा आदि। मध्य प्रदेश, हिमालय प्रदेश, उत्तरांचल, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, बिहार और दक्षिण भारत में हरड़ बहुत होता है। असम में सबसे ज्यादा हरड़ होता है। हिमालय की घाटियों के वनों में हरड़ के पेड़ बहुत ज्यादा होते हैं। हरड़ के वृक्षों का घेरा 240 से 300 सेमी तक फैल जाता है। आयुर्वेद ने हरड़ को सात भागों मे बांट रखा है। 1. विजया 2. रोहिणी 3. पूतना 4. चेतकी 5. अमृता 6. अभया 7. जीवन्ती।

गुण
आयुर्वेदिक मतानुसार हरड़ में पांचों रस-मधुर, तीखा, कडुवा, कषैला और अम्ल पाये जाते हैं। यह स्वाद में कषैली, गुण में हल्की, रूखी, प्रकृति में गर्म, विपाक में मधुर, त्रिदोषनाशक, आयुवर्द्धक, पुष्टिकारक, पाचनशक्तिवर्द्धक, बुद्धि प्रदायक, बलवर्द्धक, पाचक, मलशोधक, मूत्रल, वायु दूर करने वाली, आंखों के लिए हितकारी, बुढ़ापा दूर करने वाली होती है। यह पेट के दर्द, उल्टी, हिचकी, दर्द, पेट के कीड़े, बवासीर, कब्ज़, खांसी, श्वास, यकृत-प्लीहा, बुखार, मलेरिया, दस्त, पथरी, आंखों के रोग, पीलिया और प्रमेह में गुणकारी हैं।

हानिकारक प्रभाव
हरड़ आंतों में खराश पैदा करती है।

विभिन्न रोगों में उपचार

मुंह के छाले:
छोटी हरड़ को पानी में घिसकर छालों पर 3 बार प्रतिदिन लगाने से मुंह के छाले नष्ट हो जाते हैं।

छोटी हरड़ को बारीक पीसकर छालों पर लगाने से मुंह व जीभ के छाले मिट जाते हैं।

छोटी हरड़ को रात को भोजन करने के बाद चूसने से छाले खत्म होते हैं।

पिसी हुई हरड़ 1 चम्मच रोज रात को सोते समय गर्म दूध या गर्म पानी के साथ फंकी लें। इससे छालों में आराम मिलता है।

गैस:
छोटी हरड़ एक-एक की मात्रा में दिन में 3 बार पूरी तरह से चूसने से पेट की गैस नष्ट हो जाती है।

छोटी हरड़ को पानी में डालकर भिगो दें। रात का खाना खाने के बाद चबाकर खाने से पेट साफ हो जाता और गैस कम हो जाती है।

हरड़, निशोथ, जवाखार और पीलू को बराबर मात्रा में पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से आधा चूर्ण सुबह और शाम खाना खाने के बाद खाने से लाभ मिलता है।

घाव:
हरड़ को जलाकर उसे पीसे और उसमें वैसलीन डालकर घाव पर लगायें। इससे लाभ पहुंचेगा।

3-5 हरड़ को खाकर ऊपर से गिलोय का काढ़ा पीने से घाव का दर्द व जलन दूर हो जाती है।

एक्जिमा:
गौमूत्र में हरड़ को पीसकर तैयार लेप को रोजाना 2-3 बार लगाने से एक्जिमा का रोग ठीक हो जाता है।

बच्चों के पेट रोग (उदर):
हर हफ्ते हरड़ को घिसकर एक चौथाई चम्मच की मात्रा में शहद के साथ सेवन कराते रहने से बच्चों के पेट के सारे रोग दूर हो जाते हैं।

बुद्धि के लिए:
भोजन के दौरान सुबह-शाम आधा चम्मच की मात्रा में हरड़ का चूर्ण सेवन करते रहने से बुद्धि और शारीरिक बल में वृद्धि होती है।

भूख बढ़ाने के लिए:
हरड़ के टुकड़ों को चबाकर खाने से भूख बढ़ती है।

पतले दस्त:
कच्चे हरड़ के फलों को पीसकर बनाई चटनी एक चम्मच की मात्रा में 3 बार सेवन करने से पतले दस्त बंद हों जाएंगे।

गर्मी के फोड़े, व्रण:
त्रिफला को लोहे की कड़ाही में जलाकर उसकी राख शहद मिलाकर लगाना चाहिए।

शनैमेह पर:
त्रिफला और गिलोय का काढ़ा पिलाना चाहिए।

अण्डवृद्धि:
सुबह के समय छोटी हरड़ का चूर्ण गाय के मूत्र के साथ या एरण्ड के तेल में मिलाकर देना चाहिए या त्रिफला दूध के साथ देना चाहिए।

त्रिफला के काढ़े में गोमूत्र मिलाकर पिलाना चाहिए।

खांसी:
हरड़ और बहेड़े का चूर्ण शहद के साथ लेना चाहिए।

दर्द:
हरड़ का चूर्ण घी और गुड़ के साथ देना चाहिए।

आंख के रोग:
त्रिफला का चूर्ण 7-8 ग्राम रात को पानी में डालकर रखें। सुबह उठकर थोड़ा मसलकर कपड़े से छान लें और छाने हुए पानी से आंखों को धोएं। इससे कुछ ही दिनों के बाद आंखों के सभी तरह के रोग ठीक हो जाएंगे।

त्रिफला चूर्ण के साथ आधा चम्मच हरड़ का चूर्ण घी के साथ लें। इससे नेत्रों के रोगों में लाभ मिलता है।

पेशाब की जलन:
हरड़ के चूर्ण में शहद मिलाकर चाटकर खाने से, पेशाब करते समय होने वाला जलन और दर्द खत्म हो जाता है।

हरड़ के चूर्ण को मट्ठे के साथ रोज खाने से पेशाब के रोग ठीक हो जाते हैं।

गैस के कारण पेट में दर्द:
हरड़ का चूर्ण 3 ग्राम गुड़ के साथ खाने से गैस के कारण पेट का दर्द दूर हो जाता है।

आन्त्रवृद्धि:
हरड़ों के बारीक चूर्ण में कालानमक, अजवायन और हींग मिलाकर 5 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम हल्के गर्म पानी के साथ खाने या इस चूर्ण का काढ़ा बनाकर पीने से आन्त्रवृद्धि की विकृति खत्म होती है।

हरड़, मुलहठी, सोंठ 1-1 ग्राम पाउडर रात को पानी के साथ खाने से लाभ होता है।

आंख आना:
हरड़ को रात को पानी में डालकर रखें। सुबह उठकर उस पानी को कपड़े से छानकर आंखों को धोने से आंखों का लाल होना दूर होता है।

श्वास या दमा रोग:
सोंठ और हरड़ के काढ़े को 1 या 2 ग्राम की मात्रा तक गर्म पानी के साथ लेने से श्वास रोग ठीक हो जाता है।

हरड़, बहेड़ा, आमला और छोटी पीपल चारों को बराबर मात्रा में लेकर उसका चूर्ण तैयार कर लेते हैं। इसे एक ग्राम तक की मात्रा में शहद के साथ मिलाकर चाटने से श्वासयुक्त खांसी खत्म हो जाती है।

हरड़ को कूटकर चिलम में भरकर पीने से श्वास का तीव्र रोग थम जाता है।

मलेरिया का बुखार:
हरड़ का चूर्ण 10 ग्राम को 100 मिलीलीटर पानी में पकाकर काढ़ा बना ले। यह काढ़ा दिन में 3 बार पीने से मलेरिया में फायदा होता है।

वात-पित्त का बुखार:
हरड़, बहेड़ा, आंवला, अडूसा, पटोल (परवल) के पत्ते, कुटकी, बच और गिलोय को मिलाकर पीसकर काढ़ा बना लें, जब काढ़ा ठण्डा हो जाये तब उसमें शहद डालकर रोगी को पिलाने से वात-पित्त का बुखार समाप्त होता है।

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*🌺श्री स्वामी हरिदास🌺*

*•📿जै जै कुँज विहारी📿•*

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🌻*श्री राधेशनन्दन जी*🌻

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