श्लोक!!

संयोजयति विद्यैव नीचगापि नरं सरित् ।

समुद्रमिव दुर्धर्षं नृपं भाग्यमतः परम्॥

भावार्थ :

जिस प्रकार नीचे की ओर बहती नदी अपने साथ तृण आदि जैसे तुच्छ पदार्थों को समुद्र से जा मिलाती है,ठीक वैसे ही विद्या ही अधम मनुष्य को राजा से मिलाती है और उससे ही उसका भाग्योदय होता है।

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