खुखियां झटक कर रोये @@

सारी खुशियों को सरेआम झटक कर रोये
मेरे सपने मेरी आँखों से छलक कर रोये
तेरी आगोश में सर रक्खा, सिसक कर रोये
हम भी बच्चों की तरह पाँव पटक कर रोये
रास्ता साफ़ था, मंज़िल भी बहुत दूर न थी
बीच रस्ते में मगर पाँव अटक कर रोये
जिस घड़ी क़त्ल हवाओं ने चराग़ों का किया
मेरे हमराह जो जुगनू थे फफ़क कर रोये
अपने हालात बयां करके जो रोई धरती
चाँद तारे किसी कोने में दुबक कर रोये
क़ीमती ज़िद थी, गरीबी भी भला क्या करती
माँ के जज़्बात दुलारों को थपक कर रोये
बामशक्कत भी मुकम्मल न हुई मेरी ग़ज़ल
चंद नुक्ते मेरे काग़ज़ से सरक कर रोये

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