रिश्तो की तल्खियाँ

हमसे रिश्तों की तल्खियाँ कहतीं
फ़ासले क्यूँ हैं दरमियाँ कहतीं

सीख ले हमसे मोहब्बत का हुनर
फूल पर बैठी तितलियाँ कहतीं

भेज दें फिर से हमें दरिया में
काँच में क़ैद मछलियाँ कहतीं

हम अगर हैं तो समझो जन्नत है
हमसे मासूम बेटियाँ कहतीं

खुशबुएँ कितनी उसके दामन में
आज भी मेरी उंगलियाँ कहतीं

दर पे बादे सबा ने दस्तक दी
खोल दो हमको खिड़कियाँ कहतीं

देखिये कर के इक नई कोशिश
हमसे हर बार ग़लतियाँ कहतीं

ज़ुल्म की ये भी तो शिकायत है
हमसे ख़ामोश सिसकियाँ कहतीं

तुम बड़े वो हो, हम न बोलेंगे
प्यार से उसकी झिड़कियाँ कहतीं

और लज़्ज़त, कहीं है दुनियाँ में?
नर्म हाथों की रोटियाँ कहतीं

मेरे दीदार के बनो क़ाबिल
चिलमनों से ये झलकियाँ कहतीं

दूर रक्खें हमें सियासत से
जोड़ कर हाथ बस्तियाँ कहतीं

इक सुख़नवर शहर में है तनहा
अब रिसालों की सुर्खियां कहतीं

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