मूँद कर आँख अपनी !!

मूँद कर बस आँख अपनी इन मनाज़िर के ख़िलाफ़
कर रहे हैं हम बग़ावत दौरे-हाज़िर के ख़िलाफ़

तुझ तलक आवाज़ मेरी जाते-जाते खो गयी
रास्ते सब हो गये हैं इस मुसाफ़िर के ख़िलाफ़

हौसला जो है तो ललकारो ख़ुदा को भी कभी
क्या मिलेगा तुमको होकर हमसे क़ाफ़िर के ख़िलाफ़

इक तरफ़ था मै निहत्था इक तरफ़ वो गुलबदन
इश्क की बाज़ी मैं हारा एक माहिर के ख़िलाफ़

एक-एक कर के सभी पुर्ज़े उसी के हो गये
अब बदन में हूँ मैं तन्हा हुस्ने-जाबिर के ख़िलाफ़

फिर ख़्वाब में आया नहीं तू रात भर
तू भी शायद हो गया है एक शाइर के ख़िलाफ़

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