🌿🌿इमली के गुण….🌿🌿

*घरेलू आयुर्वेदिक उपचार💊💉*
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🌿🌿इमली के गुण….🌿🌿

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परिचय

इमली का पेड़ सम्पूर्ण भारतवर्ष में पाया जाता है। इसके अलावा यह अमेरिका, अफ्रीका और कई एशियाई देशों में पाया जाता है। इमली के पेड़ बहुत बड़े होते हैं। 8 वर्ष के बाद इमली का पेड़ फल देने लगता है। फरवरी और मार्च के महीनों में इमली पक जाती है। इमली शाक (सब्जी), दाल, चटनी आदि कई चीजों में डाली जाती है। इमली का स्वाद खट्टा होने के कारण यह मुंह को साफ करती है। पुरानी इमली नई इमली से अधिक गुणकारी होती है। इमली के पत्तों का शाक (सब्जी) और फूलों की चटनी बनाई जाती है। इमली की लकड़ी बहुत मजबूत होती है। इस कारण लोग इसकी लकड़ी से कुल्हाड़ी आदि के दस्ते भी बनाते हैं।

हानिकारक प्रभाव
कच्ची इमली भारी, गर्म और अधिक खट्टी होती है। जिन्हें इमली अनुकूल नहीं होती है, उन्हें भी पकी इमली से दान्तों का खट्टा होना, सिरदर्द और जबडे़ में दर्द, सांस की तकलीफ, खांसी और बुखार जैसे दुष्परिणाम हो सकते हैं।

विभिन्न रोगों में उपचार

प्रमेह:
6 ग्राम इमली की छाल की राख को लगभग 55 ग्राम कच्ची गिरी के साथ मिलाकर 5-6 दिन तक सुबह-शाम सेवन करना चाहिए।

125 ग्राम इमली के बीजों को 250 मिलीलीटर दूध में भिगो दें। 3 दिन के बाद छिलके उतारकर, साफ करके पीस लेते हैं। इसे सुबह-शाम 6 ग्राम की मात्रा में गाय के दूध या पानी से लेने से प्रमेह रोग दूर होता है।

पाण्डु (पीलिया) रोग:

10 ग्राम इमली की छाल की राख को 40 ग्राम बकरी के मूत्र में मिलाकर देने से लाभ मिलता है।

इमली को पानी में भिगोकर, मथ (मिलोकर) कर पानी पीना उपयोगी है।

बिच्छू के विष:
इमली के सिंके हुए बीजों को घिसें, जब इसका सफेद भाग दिखे तो इसे डंक के स्थान पर लगा दें। यह बीज विश (जहर) चूसकर अपने आप ही हटकर गिर जाएगा।

सिर दर्द:

पानी में इमली को भिगोकर इसमें थोड़ी शक्कर मिलाकर सुबह और शाम को 2 या 3 बार पीने से सिर का दर्द दूर हो जाता है।

10 ग्राम इमली को 1 गिलास पानी में भिगोकर थोड़ा सा मसलकर और छानकर उसमें शक्कर मिलाकर पीने से पित्त से उत्पन्न सिर दर्द दूर होता है।

इमली की छाल का चूर्ण अथवा राख गर्म जल में डालकर पीने सिर दर्द में लाभ होता है।

चूहे के विष पर:
40 ग्राम इमली और 20 ग्राम धमासे को पुराने घी में मिलाकर 7 दिन तक खाने से चूहे का जहर उतर जाता है।

आंखों में दर्द:
इमली के हरे पत्तों और एरण्ड के पत्तों को गर्म कर इसका रस निकाल लें, फिर इसमें फूली हुई फिटकरी और चना भर अफीम तांबे के बर्तन में घोंटे और उसमें कपड़ा भिगोकर आंखों में रखें। इससे आंखों के दर्द में लाभ होता है।

अजीर्ण (पुरानी कब्ज):
इमली की ऊपर की छाल को जलाकर, सोते समय लगभग 6 ग्राम गर्म पानी के साथ सेवन करने से अजीर्ण रोग में लाभ होता है।

भूख कम लगना:
इमली के पत्तों की चटनी बनाकर खाने से भूख तेज लगने लगती है।

भांग के नशे पर:
इमली को गलाकर उसका पानी पीने से भांग का नशा उतर जाता है।

अरुचि और पित्त:
अन्दर से पकी हुई तथा अधिक गूदेवाली इमली को ठण्डे पानी में डालकर इसमें शक्कर मिलाना चाहिए। इसके बाद इसमें इलायची के दाने, लौंग, कपूर और कालीमिर्च डालकर बार-बार कुल्ला करें। इससे अरुचि और पित्त का रोग दूर होता है।

कब्ज तथा पित्त:
1 किलो इमली को 2 लीटर पानी में 12 घंटे तक गर्म करें, जब आधा पानी जल जाये तो उसमें 2 किलो चीनी मिला दें। इसे शर्बत की तरह बनाकर रोजाना 20 ग्राम से लेकर 50 ग्राम तक कब्ज वाले रोगी को रात में और पित्त वाले को सुबह उठते ही पीने से लाभ होता है।

अजीर्ण और अरुचि:
सुपारी के बराबर पुरानी इमली को लेकर 1 कलई के बर्तन में 250 मिलीलीटर पानी में डालकर उसमें भिगोकर रख दें। जब यह खूब अच्छी तरह गल जाए तो हाथ से अच्छी तरह मसलकर उसका पानी दूसरे कलई के बर्तन में निकाल लें और फिर उसमें काला नमक, जीरा और शक्कर डालकर घी में हींग को बघारकर छौंक दें। यह इमली का पानी बहुत रुचिकारक और अन्न को पकाने वाला होता है।

पित्त विकार:
रात के समय लगभग 1 किलो इमली लेकर एक कलई के बर्तन में पानी डालकर भिगो दें। इसे रात भर भीगा रहने दें। दूसरे दिन पानी सहित बर्तन को चूल्हे पर चढ़ा दें, जब यह अच्छी तरह उबल जाये तो इसे छानकर इसमें 2 किलो चीनी डालकर चाशनी बना लें। इसे 10-10 ग्राम में मात्रा में देने से पित्त शांत होती है और उल्टी भी बंद हो जाती है। इसे इमली का शर्बत कहा जाता है।

नशा (शराब, भांग आदि मादक पदार्थों का नशा):
30 ग्राम इमली तथा खजूर, 10-10 ग्राम कालीद्राक्ष, अनारदाने, फालसे और आंवले लेकर आधा किलो पानी में डालकर भिगो दें। इसके अच्छी तरह भीग जाने पर छान लें। यह शर्बत नशा चढ़ने पर थोड़ा-2 सा पीने से नशा उतर जाता है।

उल्टी और अम्लपित्त:

इमली की छाल उसके छिलके सहित जलाएं। फिर 10 ग्राम राख को पानी में डालकर पिलाएं। इससे उल्टी तुरन्त बंद हो जाती है।

अम्लपित्त की जलन और उल्टी होने पर यह पानी भोजन के बाद देना चाहिए।

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श्री राधेशनन्दन जी

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