🌻🌹*⚜गणेश जी की शर्त🌻🌹*⚜

*(श्री राधा विजयते नमः)*

*(श्रीमत् रमणविहारिणे नमः)*

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🌻🌹*⚜गणेश जी की शर्त🌻🌹*⚜

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गणेश जी की शर्त

भगवान व्यास महर्षि पराशर के कीर्तिमान पुत्र थे। चारों वेदों को क्रमबद्ध करके उनका संकलन करने का श्रेय इन्हीं को है। महाभारत की पावन कथा भगवान व्यास की ही देन है। महाभारत की कथा व्यास जी के मानस-पटल पर अंकित हो चुकी थी, लेकिन उनको यह चिंता हुई कि इसे संसार को किस तरह प्रदान करें! यह सोचते-सोचते उन्होंने ब्रह्मा का ध्यान किया और ब्रह्मा प्रत्यक्ष हुए। व्यास जी ने उनके सामने सिर नवाया और हाथ जोड़कर निवेदन किया- “भगवन! एक महान ग्रन्थ की रचना मेरे मानस-पटल पर हुई है। अब चिंता इस बात की है कि इसे लिपिबद्ध कौन करे?” यह सुनकर ब्रह्मा बडे प्रसन्न हुए। उन्होंने व्यास जी की बहुत प्रशंसा की और बोले- “तात! तुम गणेश जी को प्रसन्न करो। वे ही तुम्हारे ग्रन्थ को लिखने में समर्थ होंगे।” इतना कहकर ब्रह्मा जी अन्तर्धान हो गये। महर्षि व्यास ने गणेश जी का ध्यान किया। प्रसन्नवदन गणेश जी व्यास जी के सामने उपस्थित हुए। महर्षि ने उनकी विधिवत पूजा की और उनको प्रसन्न देखकर बोले- “हे गणेश, एक महान ग्रन्थ की रचना मेरे मस्तिष्क में हुई है। आपसे प्रार्थना है कि आप उसे लिपिबद्ध करने की कृपा करें।” गणेश जी ने व्यास जी की प्रार्थना स्वीकार तो की, लेकिन बोले- “आपका ग्रन्थ लिखवाने को मैं तैयार हूँ, लेकिन मेरी एक शर्त है और वह यह कि अगर मैं लिखना शुरू करूँ तो फिर लेखनी जरा भी न रुकने पाये। अगर आप लिखाते-लिखाते जरा भी रुके तो मेरी लेखनी भी रुक जायेगी और फिर आगे नहीं चलेगी। क्या आपसे यह हो सकेगा?” गणेश जी की शर्त जरा कठिन थी, लेकिन व्यास जी ने तुरन्त मान ली। वह बोले- “आपकी शर्त मुझे मंजूर है, पर विघ्नहरण, मेरी भी एक शर्त है। वह यह कि आप भी जब लिखें, तब हर श्लोक का अर्थ ठीक-ठीक समझ लें, तभी लिखें।” व्यास जी का यह कथन सुन गणेश जी हंस पडे। बोले- “तथास्तु!” और फिर व्यास जी तथा गणेश जी आमने-सामने बैठ गये। व्यास जी बोलते जाते थे और गणेश जी लिखते जाते थे। गणेश जी की गति तेज थी, इस कारण बीच-बीच में व्यास जी श्लोकों को जरा जटिल बना देते जिससे गणेश जी को समझने में कुछ देर लग जाती और उनकी लेखनी कुछ देर के लिये रुक जाती थी। इसी बीच व्यास जी कई और श्लोकों की मन-ही-मन रचना कर लेते थे। इस तरह महाभारत की कथा व्यास जी की ओजपूर्ण वाणी से प्रवाहित हुई और गणेश जी की अथक लेखनी ने उसे लिपिबद्ध किया। ग्रन्थ तैयार हो गया तो व्यास जी के मन में उसे सुरक्षित रखने तथा उसके प्रचार का प्रश्न उठा। उन दिनों छापेखाने तो थे नहीं। लोग ग्रन्थों को कण्ठस्थ कर लिया करते थे और इस प्रकार स्मरण शक्ति के सहारे उनको सुरक्षित रखते थे।

व्यास जी ने महाभारत सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेव को कण्ठस्थ कराई और बाद में अपने दूसरे शिष्यों को। कहते हैं कि देवों को नारद मुनि ने महाभारत की कथा सुनाई थी, और शुक मुनि ने गन्धर्वों, राक्षसों तथा यक्षों में इसका प्रचार किया। यह तो सब जानते ही हैं कि मानव-जाति में महाभारत की कथा का प्रसार महर्षि वैशम्पायन के द्वारा हुआ। वैशम्पायन व्यास जी के प्रमुख शिष्य थे। वह बड़े विद्वान और धर्मनिष्ठ थे। महाराजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने एक बड़ा यज्ञ किया। उसमें उन्होंने वैशम्पायन से महाभारत की कथा सुनाने की प्रार्थना की थी। वैशम्पायन जी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और महाभारत की कथा विस्तारपूर्वक कह सुनाई। इस महायज्ञ में सुप्रसिद्ध पौराणिक सूत जी भी मौजूद थे। महाभारत की कथा सुनकर वह बहुत ही प्रभावित हुए। भगवान व्यास के इस महाकाव्य से मनुष्य-मात्र को लाभ पहुँचाने की इच्छा उनके मन में प्रबल हुई। इस उद्देश्य से सूत जी ने नैमिषारण्य में समस्त ऋषियों की एक सभा बुलाई। महर्षि शौनक इस सभा के अध्यक्ष हुए। “महाराज जनमेजय के नाग-यज्ञ के अवसर पर महर्षि वैशम्पायन ने व्यास जी की आज्ञा से महाभारत की कथा सुनाई थी। वह पवित्र कथा मैंने सुनी और तीर्थाटन करते हुए कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि को भी जाकर देखा।” महाराजा शान्तनु के बाद उनके पुत्र चित्रांगद हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठे। उनकी अकाल मृत्यु हो जाने पर उनके भाई विचित्रवीर्य राजा हुए। उनके दो पुत्र हुए- धृतराष्ट्र और पाण्डु। बड़े लड़के धृतराष्ट्र जन्म से ही अन्धे थे, इसलिये पाण्डु को गद्दी पर बैठाया गया। पाण्डु ने कई वर्षों तक राज्य किया। उनकी दो रानियाँ थीं- कुन्ती और माद्री। कुछ काल राज्य करने के बाद पाण्डु अपने किसी अपराध का प्रायश्चित के लिए तपस्या करने जंगल में गये। उनकी दोनों रानियाँ भी उनके साथ गईं। वनवास के समय कुन्ती और माद्री ने पाँच पाँडवों को जन्म दिया। कुछ समय बाद पाण्डु की मृत्यु हो गई। पाँचों अनाथ बच्चों का वन के ऋषि-मुनियों ने पालन-पोषण किया और पढ़ाया-लिखाया। जब युधिष्ठिर सोलह वर्ष के हुए तो ऋषियों ने पाँचों कुमारों को हस्तिनापुर ले जाकर भीष्म को सौंप दिया। पाँचों पाण्डव बुद्धि से तेज और शरीर से बली थे। छुटपन में ही उन्होंने वेद, वेदांग तथा सारे शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था। क्षत्रियोचित शस्त्र-विद्याओं में भी वे दक्ष हो गये थे। उनकी प्रखर बुद्धि और मधुर स्वभाव ने सबको मोह लिया था। यह देखकर धुतराष्ट्र के पुत्र कौरव उनसे जलने लगे और उन्होंने उनको तरह तरह से कष्ट पहुँचाना शुरू किया। दिन-पर-दिन कौरवों और पाण्डवों के बीच वैर भाव बढ़ता गया। अतं में पितामह भीष्म ने दोनों को किसी तरह समझाया और उनके बीच सन्धि कराई। भीष्म के आदेशानुसार कुरु राज्य के दो हिस्से किये गये। कौरव हस्तिनापुर में ही राज करते रहे और पाँडवों को एक अलग राज्य दे दिया गया, जो आगे चलकर इन्द्रप्रस्थ के नाम से मशहूर हुआ।

इस प्रकार कुछ दिन शांति रही। उन दिनों लोगों में चौसर खेलने का आम रिवाज था। राज्य तक की बाजियाँ लगा दी जाती थीं। इस रिवाज के मुताबिक एक बार पाँडवों और कौरवों ने चौपड़ खेला। कौरवों की तरफ से कुटिल शकुनि खेला। उसने धर्मात्मा युधिष्ठिर को हरा दिया। इसके फलस्वरूप पाँडवों का राज्य छिन गया और उनको तेरह वर्ष का वनवास भोगना पड़ा। उसमें एक शर्त यह भी थी कि बारह वर्ष के बाद एक वर्ष अज्ञातवास करना होगा। उसके बाद उनका राज्य उन्हें लौटा दिया जायेगा। द्रौपदी के साथ पांचों पांडव बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास में बिताकर वापस लौटे। पर लालची दुर्योधन ने लिया हुआ राज्य वापस करने से इनकार कर दिया। अतः पाँडवों को अपने राज्य के लिये लड़ना पड़ा। युद्ध में सारे कौरव मारे गये, तब पाँडव उस विशाल साम्राज्य के स्वामी हुए। इसके बाद छत्तीस वर्ष तक पाँडवों ने राज्य किया और फिर अपने पोते परीक्षित को राज्य देकर द्रौपदी के साथ तपस्या करने हिमालय चले गये। संक्षेप में यही महाभारत है। महाभारत की गणना भारतीय साहित्य-भण्डार के सर्वश्रेष्ठ महाग्रन्थों में की जाती है। इसमें पाँडवों की कथा के साथ अनेक सुन्दर उपकथाएँ हैं तथा बीच-बीच में सूक्तियाँ एवं उपदेशों के उज्ज्वल रत्न भी जुड़े हुए हैं। महाभारत एक विशाल महासागर है, जिसमें अनमोल मोती और रत्न भरे पड़े हैं। रामायण और महाभारत संस्कृति और धार्मिक विचार के मूल स्त्रोत माने जा सकते हैं।

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*🌺श्री स्वामी हरिदास🌺*

*•📿जै जै कुँज विहारी📿•*

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🌻*श्री राधेशनन्दन जी*🌻
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