श्री मान मन्दिर बरसाना

*(श्री राधा विजयते नमः)*

*(श्रीमत् रमणविहारिणे नमः)*

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🌻 🌹 * ⚜ श्री मान मन्दिर ( बरसाना ) ⚜ *🌻🌹

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🍀🕊 🔯 श्री मान मन्दिर (बरसाना)🕊🍀
बैठक जी से पश्चिम ऊपर चोटी पर मान गढ़ है | जहाँ श्री राधा मान करती हैं | इस शिखर का नाम मानगढ़ है | मानगढ़ में रूठी हुई राधा रानी को श्याम सुन्दर ने मनाया था | इस के कारण इस स्थली का नाम मानगढ़ पड़ा | मान माने रूठना | श्री कृष्ण ने मनाने के बहुत से उपाए किये | कभी उनके चरणों में मस्तक रखते हैं, कभी उनको पंखा करते हैं , कभी दर्पण दिखाते हैं और कभी विनती करते हैं ,पर जब राधा रानी नहीं मानती हैं तब श्याम सुन्दर सखियों का सहारा लेते हैं | ये मान किसी लड़ाई या क्रोध से नहीं होता है | ये मान एक प्रेम की लीला है | राधा रानी श्याम सुन्दर के सुख हेतु मान करती हैं | मान मंदिर में श्री मान बिहारी लाल जी के दर्शन हैं |
मान मन्दिर प्रार्थन मन्त्र
देवगन्धर्व रम्याय राधामानविधायिने |
मानमन्दिर संज्ञाय नमस्ते रत्नभूमये ||
अर्थात देवता और गन्धर्वों से रमणीक श्री राधिका की मान लीला करवाने वाले रत्न भूमिमय मान मन्दिर को नमस्कार है |
नित्य विहार में संभ्रममान रसिकों ने माना है | जो दीर्घ मान नहीं होता है – व्यास वाणी से ( पद संख्या – १६४ )
मानगढ़ चढत सखी कत आजु |
‘व्यास’ बचन सुनि कुंवरि निवाज्यो
श्याम लयौ सिर ताजु ||
संभ्रम मान – पद १२८
श्री प्रिया जी श्री कृष्ण के वक्षस्थल में अपने प्रतिबिम्ब को देखकर बात करती हैं | क्योंकि वही मान का कारण है – किन्तु कृपामयी का मान क्षणिक था – “पिय के हिय तैं तू न टरति री |”
यदि कुछ अधिक समय तक मान रहता है तो “मान गढ़” में मान कई प्रकार से टूटता है | (१) श्री कृष्ण स्वयं विनय एवं सेवा से मना लेते हैं |
बैठक जी से पश्चिम ऊपर चोटी पर मान गढ़ है | जहाँ श्री राधा मान करती हैं | इस शिखर का नाम मानगढ़ है | मानगढ़ में रूठी हुई राधा रानी को श्याम सुन्दर ने मनाया था | इस के कारण इस स्थली का नाम मानगढ़ पड़ा | मान माने रूठना | श्री कृष्ण ने मनाने के बहुत से उपाए किये | कभी उनके चरणों में मस्तक रखते हैं, कभी उनको पंखा करते हैं , कभी दर्पण दिखाते हैं और कभी विनती करते हैं ,पर जब राधा रानी नहीं मानती हैं तब श्याम सुन्दर सखियों का सहारा लेते हैं | ये मान किसी लड़ाई या क्रोध से नहीं होता है | ये मान एक प्रेम की लीला है | राधा रानी श्याम सुन्दर के सुख हेतु मान करती हैं | मान मंदिर में श्री मान बिहारी लाल जी के दर्शन हैं |
मान मन्दिर प्रार्थन मन्त्र
देवगन्धर्व रम्याय राधामानविधायिने |
मानमन्दिर संज्ञाय नमस्ते रत्नभूमये ||
अर्थात देवता और गन्धर्वों से रमणीक श्री राधिका की मान लीला करवाने वाले रत्न भूमिमय मान मन्दिर को नमस्कार है |
नित्य विहार में संभ्रममान रसिकों ने माना है | जो दीर्घ मान नहीं होता है – व्यास वाणी से ( पद संख्या – १६४ )
मानगढ़ चढत सखी कत आजु |
‘व्यास’ बचन सुनि कुंवरि निवाज्यो
श्याम लयौ सिर ताजु ||
संभ्रम मान – पद १२८
श्री प्रिया जी श्री कृष्ण के वक्षस्थल में अपने प्रतिबिम्ब को देखकर बात करती हैं | क्योंकि वही मान का कारण है – किन्तु कृपामयी का मान क्षणिक था – “पिय के हिय तैं तू न टरति री |”
यदि कुछ अधिक समय तक मान रहता है तो “मान गढ़” में मान कई प्रकार से टूटता है | (१) श्री कृष्ण स्वयं विनय एवं सेवा से मना लेते हैं |

व्यासवाणी पद १५६
सब निसि ढ़ोवा करति किसोरहि, भोर मानगढ़ टूटयौ ||
‘व्यास’ स्वामिनी मिली बांह दै, पुनि लचि लालन लूटयौ ||
पुन: केलिमाल – १०
भूले भूले हूँ मान न करि री प्यारी |
इसी प्रकार पद संख्या – २२, २५, ३९,५९,५७, ७६, ७८, ७९, ८० आदि पद भी हैं |
(२) छद्म से वीणा वादिनी आदि के रूप में प्रिया जी प्रसन्न करके छद्म खोलना | – (श्री मैन प्रभु जी महाराज )
गुपाल वृंदावन महियाँ खेलत फाग सुहाई |” ….
“सुरंग चूनरी ओढि सांवरो तिय कौ भेष बनाई |” …..
गये जहाँ बैठी श्री श्यामा मुरली मधुर बजाई |
रीझी रीझी बचन कहि मीठे निपट निकट बैठाई ||
पूछत बहुत कृपा करि श्यामा कहौ कहाँ ते आई |
नंदगाँव सुख ठांवे तहां के कहियत कुंवर कन्हाई ||
सुनत ही नाम पीठि हंसि दीनी चीन्ही हरि लंगराई |
पकरी बांह लई उर अन्तर चाचरी मैं न मचाई ||
‘रसिक
तथा विदग्ध माधव में निकुंज विद्या का छद्म एवं सैमरी में श्यामली सखी का छदम तथा किन्नरी का छद्म जिसमें – रत्नमाला पुरस्कार के स्थान पर मान रत्न मांगकर भंगकर कराना |
(३) छद्म से सखी रूप बनाकर समझाते हैं – व्यासवाणी पद संख्या १४२
अजहूँ माई टेव न मिटति मान की |
जानति पिय की पीर न मानति सोंह बबा वृषभान की |
अन्य सखियों की सहायता से | –
(४) श्री गोविन्द स्वामी –
आवत जात हौं हार परी री |
ज्यों ज्यों प्यारो विनती कर पठवत, त्यों त्यों तू गढ़मान चढ़ी री |
तिहारे बीच परे सोई बाबरी, हौं चौगान की गेंद भई रीं |
‘गोविन्द’ प्रभु को वेग मिल भामिनी, सुभगयामिनी जात बही री |
गोविन्द जी का पद है | इसमें ऐसा लिखा है कि राधा रानी का मान शिखर के नीचे से शुरू हुआ और जैसे – जैसे श्याम सुंदर ने मनाया वैसे – वैसे श्री जी ऊपर चढ़ती आयीं | जब श्री जी ऊपर चढ़ आयीं तो श्याम सुंदर ने सखियों का सहारा लिया | उन्होंने विशाखा जी व ललिता जी से कहा कि जाओ राधा रानी को मनाओ | हमारी तो सामर्थ नहीं है | हम तो थक गये , तो श्री ललिता जी व अन्य सखियाँ जब यहाँ आती हैं और श्री जी से कहती हैं कि आप अपना मान तोड़ दो तो श्री जी मना कर देती हैं |
सखी ठाकुर जी के पास नीचे जाती हैं तो ठाकुर जी फिर ऊपर भेज देते हैं | फिर नीचे जाती हैं तो फिर ऊपर भेज देते हैं | तो आखिर में सखी बोली कि हे राधे मानगढ़ पे मैं कई बार चढ़ी और कई बार उतरी | मैं तो थक गई | आपका मान तो टूटता ही नहीं | मैं और कहाँ तक दौडूँ ? इधर से आप भगा देती हो और उधर से वो बार-बार प्रार्थना करते हैं कि जाओ-जाओ |
सखी कहती है कि हे राधे मैं चौगान की गेंद की तरह से भटक रही हूँ | क्रिकेट में तो एक आदमी गेंद को मरता है पर चौगान में हर कोई गेंद को मरता है | वैसे ही आप दोनों मुझे मार रहे हैं | हे राधे जल्दी से श्याम सुंदर से मिलो | ये रात बीतती जा रही है | 🕊
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*🌺श्री स्वामी हरिदास🌺*

*•📿जै जै कुँज विहारी📿•*

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🌻*श्री राधेशनन्दन जी*🌻

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