श्री हरिदास जू


स्वामी हरिदास जू

पूरा नाम  स्वामी हरिदास 
जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष अष्टमी 1535 विक्रम सम्वत् (अनुमानित) जन्म 
भूमि वृंदावन, उत्तर प्रदेश 
मृत्यु 1630 विक्रम सम्वत् (अनुमानित) 
मृत्यु स्थान निधिवन, 
वृंदावन अभिभावक श्री आशुधीर और श्रीमती गंगादेवी 
कर्म भूमि ब्रज 
कर्म-क्षेत्र भक्त कवि, शास्त्रीय संगीतकार, सखी संप्रदाय प्रवर्तक नागरिकता भारतीय 
अन्य जानकारी प्रसिद्ध गायक तानसेन इनके शिष्य थे। सम्राट अकबर इनके दर्शन करने वृंदावन गए थे। ‘केलिमाल’ में इनके सौ से अधिक पद संग्रहित हैं। 

स्वामी हरिदास भक्त कवि, शास्त्रीय संगीतकार तथा कृष्णोपासक सखी संप्रदाय के प्रवर्तक थे, जिसे ‘हरिदासी संप्रदाय’ भी कहते हैं। इन्हें ललिता सखी का अवतार माना जाता है। इनकी छाप रसिक है। इनके जन्म स्थान और गुरु के विषय में कई मत प्रचलित हैं। इनका जन्म समय कुछ ज्ञात नहीं है। हरिदास स्वामी वैष्णव भक्त थे तथा उच्च कोटि के संगीतज्ञ भी थे। प्रसिद्ध गायक तानसेन इनके शिष्य थे। सम्राट अकबर इनके दर्शन करने वृंदावन गए थे। ‘केलिमाल’ में इनके सौ से अधिक पद संग्रहित हैं। इनकी वाणी सरस और भावुक है। ये प्रेमी भक्त थे। जीवन परिचय श्री बांकेबिहारीजी महाराज को वृन्दावन में प्रकट करने वाले स्वामी हरिदासजी का जन्म विक्रम सम्वत् 1535 में भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी (श्री राधाष्टमी) के ब्रह्म मुहूर्त में हुआ था। आपके पिता श्री आशुधीर जी अपने उपास्य श्रीराधा-माधव की प्रेरणा से पत्नी गंगादेवी के साथ अनेक तीर्थो की यात्रा करने के पश्चात् अलीगढ जनपद की कोल तहसील में ब्रज आकर एक गांव में बस गए। हरिदास जी का व्यक्तित्व बड़ा ही विलक्षण था। वे बचपन से ही एकान्त-प्रिय थे। उन्हें अनासक्त भाव से भगवद्-भजन में लीन रहने से बड़ा आनंद मिलता था। हरिदासजी का कण्ठ बड़ा मधुर था और उनमें संगीत की अपूर्व प्रतिभा थी। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। उनका गांव उनके नाम से विख्यात हो गया। हरिदास जी को उनके पिता ने यज्ञोपवीत-संस्कार के उपरान्त वैष्णवी दीक्षा प्रदान की। युवा होने पर माता-पिता ने उनका विवाह हरिमति नामक परम सौंदर्यमयी एवं सद्गुणी कन्या से कर दिया, किंतु स्वामी हरिदास जी की आसक्ति तो अपने श्यामा-कुंजबिहारी के अतिरिक्त अन्य किसी में थी ही नहीं। उन्हें गृहस्थ जीवन से विमुख देखकर उनकी पतिव्रता पत्नी ने उनकी साधना में विघ्न उपस्थित न करने के उद्देश्य से योगाग्नि के माध्यम से अपना शरीर त्याग दिया और उनका तेज स्वामी हरिदास के चरणों में लीन हो गया। वृन्दावन प्रस्थान विक्रम सम्वत् 1560 में पच्चीस वर्ष की अवस्था में हरिदास वृन्दावन पहुंचे। वहां उन्होंने निधिवन को अपनी तपोस्थली बनाया। हरिदास जी निधिवन में सदा श्यामा-कुंजबिहारी के ध्यान तथा उनके भजन में तल्लीन रहते थे। स्वामीजी ने प्रिया-प्रियतम की युगल छवि श्री बांकेबिहारीजी महाराज के रूप में प्रतिष्ठित की। हरिदासजी के ये ठाकुर आज असंख्य भक्तों के इष्टदेव हैं। वैष्णव स्वामी हरिदास को श्रीराधा का अवतार मानते हैं। श्यामा-कुंजबिहारी के नित्य विहार का मुख्य आधार संगीत है। उनके रास-विलास से अनेक राग-रागनियां उत्पन्न होती हैं। ललिता संगीत की अधिष्ठात्री मानी गई हैं। ललितावतार स्वामी हरिदास संगीत के परम आचार्य थे। उनका संगीत उनके अपने आराध्य की उपासना को समर्पित था, किसी राजा-महाराजा को नहीं। बैजूबावरा और तानसेन जैसे विश्व-विख्यात संगीतज्ञ स्वामी जी के शिष्य थे। मुग़ल सम्राट अकबर उनका संगीत सुनने के लिए रूप बदलकर वृन्दावन आया था। विक्रम सम्वत 1630 में स्वामी हरिदास का निकुंजवास निधिवन में हुआ। 

टीका टिप्पणी और संदर्भ ↑ 

अरे मर्त्य प्राणी क्यों अभिमान करता है? तेरा शरीर कुतों और श्रृगालों का भोज्य बनेगा, तथापि तू निर्ल्लज्ज और निर्भय ऐंठकर चलता है। सभी का यह अन्त सारे संसार को विदित है। ब्राह्मण वीरबल एक महान् पुरुष था, तथापि उसकी मृत्यु हुई। उसकी मृत्यु से सम्राट अकवर का हृदय शोकाकुल हुआ। वह भी जीवित न रहा और न कोई सहायता मिली। जब देवासुर मृत्यु को प्रापत होते हैं, मृत्यु उनकी जुगाली करती है। न इधर न उधर , बीच में ही तू किस किसके घर भटकता है सभी भ्रमित हैं और अभिमान में फूले हुए हैं, तेरा किस पर विश्वास है? हरि के पद-कमलों की आराधना कर। घर-घर घूमना और भटकना सब अभिमान है। हरिदास के विषुल वल से विठ्ठुल देव जू ने उस सर्वाच्च को प्राप्त कर लिया है।

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