कभी मत झगड़ना इनसे

जै जै कुँज विहारी                                                                           जै जै कुँज विहारी
(श्री राधा विजयते नमः) 
(श्री मत् रमण विहारिणे नमः)
भूलकर भी मत लड़ना !!
दिनाँक :- 17/09/2018
स्वामी श्री हरिदास राधेशनन्दन जू


मनुस्‍मृति: इन 15 लोगों से भूलकर भी नहीं करना चाहिए विवाद !!❌❌
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मनु स्‍मृति में कहा गया है ‘ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः। बालवृद्धातुरैर्वैधैर्ज्ञातिसम्बन्धिबांन्धवैः।। मातापितृभ्यां यामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया। दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत्।।’ यानी इन 15 लोगों से कभी भी विवाद नहीं करना चाहिए। यदि इन लोगों से विवाद होता है तो व्‍यक्‍ति को नुकसान उठाना पड़ता है। जानिए आखिर कौन हैं ये 15 लोग जिनसे विवाद नहीं करना चाहिए।
यज्ञ करने वाला :यज्ञ करने वाला ब्राह्मण सदैव सम्मान करने योग्य होता है। यदि उससे किसी प्रकार की कोई चूक हो जाए तो भी उसके साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि आप ऐसा करेंगे तो इससे आपकी प्रतिष्ठा ही धूमिल होगी।
पुरोहित: भूल कर भी कभी पुरोहित से विवाद नहीं करना चाहिए। पुरोहित के माध्यम से पूजन आदि शुभ कार्य संपन्न होते हैं जिसका पुण्य यजमान (यज्ञ करवाने वाला) को प्राप्त होता है। पुरोहित से वाद-विवाद करने पर आपका काम बिगड़ सकता है।
आचार्य : मनु स्मृति के अनुसार आचार्य यानी स्कूल टीचर्स से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। वह यदि दंड भी दें तो उसे स्वीकार करना चाहिए। आचार्य (टीचर्स) हमेशा अपने छात्रों का भला सोचते हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर विद्यार्थी का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।
अतिथि : हिंदू धर्म में अतिथि यानी मेहमान को भगवान माना जाता है। उसका आवभगत ठीक तरीके से करनी चाहिए। भूल से भी कभी अतिथि के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। अतिथि से वाद-विवाद करने पर आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस लग सकती है।
माता : माता ही शिशु की सबसे प्रथम शिक्षक होती है। यदि कभी माता से कोई भूल-चूक हो जाए तो उससे वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। माता का स्थान गुरु व भगवान से ही ऊपर माना गया है। इसलिए माता सदैव पूजनीय होती हैं।
पिता :पिता जन्म से लेकर युवावस्था तक हमारा पालन-पोषण करते हैं। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पिता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। पिता जीवनभर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। ऐसे में वाद-विवाद से व्‍यक्‍ति को परेशानी हो सकती है।
मामा आदि संबंधी: मामा आदि संबंधी जैसे काका-काकी, ताऊ-ताईजी, बुआ-फूफाजी, ये सभी वो लोग होते हैं, जो बचपन से ही हम पर स्नेह रखते हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर समाज में हमें सभ्य नहीं समझा जाएगा। हमारी प्रतिष्‍ठा को ठेस लग सकती है।
भाई: हिंदू धर्म के अनुसार बड़ा भाई पिता के समान तथा छोटा भाई पुत्र के समान होता है। बड़ा भाई सदैव मार्गदर्शक बन कर हमें सही रास्ते पर चलने के प्रेरित करता है और यदि भाई छोटा है तो उसकी गलतियां माफ कर देने में ही बड़प्पन है। इसलिए भाई छोटा हो या बड़ा उससे किसी भी प्रकार का वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।
बहन: भारतीय सभ्यता में बड़ी बहन को माता तथा छोटी बहन को पुत्री माना गया है। बड़ी बहन अपने छोटे भाई-बहनों को माता के समान स्नेह करती है। संकट के समय सही रास्ता बताती है। इसलिए मनु स्मृति में कहा गया है कि बहन के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।
पुत्र: हिंदू धर्म ग्रंथों में पुत्र को पिता का स्वरूप माना गया है। यानी पुत्र ही पिता के रूप में पुनः जन्म लेता है। पुत्र के पिंडदान तर्पण आदि करने पर ही पिता की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पुत्र से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।
पुत्री : भारतीय संस्कृति में पुत्री को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। संभव है कि पुत्र वृद्धावस्था में माता-पिता का पालन-पोषण न करे, लेकिन पुत्री अपने माता-पिता का साथ निभाती है। परिवार में होने वाले हर मांगलिक कार्यक्रम की रौनक पुत्रियों से ही होती है। इसलिए पुत्री से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।
पत्नी : हिंदू धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी माना जाता है। शुभ कार्य एवं पूजन में पत्नी का साथ होना अनिवार्य माना गया है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पत्नी से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।
पुत्रवधू : भारतीय संस्कृति के अनुसार पुत्रवधू को भी पुत्री के समान समझा जाता है। पुत्रियों के अभाव में पुत्रवधू से ही घर में रौनक रहती है। कुल की मान-मर्यादा भी पुत्रवधू के हाथों में होती है। इसलिए यदि पुत्रवधू से कभी कोई चूक भी हो जाए तो भी उसके साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।
नौकर : मनु स्मृति के अनुसार नौकर से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि वह आपकी एवं आपके परिवार की गुप्त बातें जानता है। वाद-विवाद करने पर वह उन्‍हें सार्वजनिक कर सकता है। इसलिए नौकर से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।
दामाद : धार्मिक ग्रंथों में दामाद को भी पुत्र के समान माना गया है। पुत्र के न होने पर दामाद ही उससे संबंधित सभी जिम्मेदारी निभाता है। दामाद से इसलिए भी विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका असर आपकी पुत्री के दाम्पत्य जीवन पर भी पढ़ सकता है।
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