नारी

जै जै कुँज विहारी                                                                                                                    जै जै कुँज विहारी
(श्री राधा विजयते नमः)
नारी सशक्तिकरण :- अब नए उड़ान की एक नयी परिभाषा


Date:- 14/09/2018
स्वामी श्री हरिदास राधेशनन्दन जू
                           
हा जाता है की जीवनरुपी गाड़ी के दो पहिये है स्त्री और पुरुष और इन्ही दोनों के सहयोग से तथा सामंजस्य से ही जीवन रूपी गाड़ी चल सकती है स्पष्ट है कि सामाजिक जीवन में स्त्री एवं पुरुष दोनों की आवश्यकता समान रूप से है और इसके महत्व को स्वीकार भी किया जाता है| लेकिन स्त्रियों की सामाजिक स्थिति सदैव पुरुषो के समान व बराबर नहीं है |बिभिन्न युगों से इनकी सामाजिक स्थिति में काफी उतार चढ़ाव होता रहा है शिक्षा के कारण वर्तमान समय में इनकी स्थिति बेहतर है
      वैसे किसी भी देश ,राष्ट्र ,समाज की संरचना और उनकी स्थिति का दायित्व एव अस्तित्व उस देश या समाज की नारी पर निर्भर करता है क्युकी देश का विकास बहुत हद तक उस देश की स्त्रियों पर ही निर्भर करता है किसी भी देश के विकास में नारी पहिये के समान होती है, जो देश को प्रगति के पथ पर आगे ले जाती है ये पुरुषो के समान सामाजिक आर्थिक राजनैतिक सांस्कृतिक आदि कार्यो में महत्वपूर्ण सहयोग करती है पुरुषो के कंधे से कन्धा मिला कर काम करती है और देश को आगे बढाने में पुरुषो का सहयोग करती है तथा उनको प्रेरित एव उत्साहित करती है यह कार्य केवल घर से बाहर रह कर ही नहीं करती बल्कि घर के अंदर रहकर घरेलु कार्य करते हुए करती है
      महिलाये किसी भी देश के आधी आबादी होती है इस श्रम शक्ति के इतने बड़े भाग की उपेक्षा करके किसी भी देश के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती अत: देश के हर प्रगति हर विकास एवं हर पतन का आधा श्रेय उन्ही को दिया जाता है इससे स्पष्ट होता है की स्त्रिया समाज के रीढ़ होती है
परिवर्तन प्रकृति का नियम है जो कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्रो में किसी न किसी रूप में होता रहता है इतिहास इस बात का गवाह है की प्राचीन काल से लेकर आज तक महिलाओ के स्थिति में लगातार कुछ न कुछ  परिवर्तन होते रहा है समाज में कभी उन्हें देवी मानकर महत्वपूर्ण स्थान देकर पूजा गया तो कभी नीच,दुष्ट,कलंकनी इत्यादि नाम से तिरस्कृत भी किया गया तो कभी सती के नाम पर बलि भी चढ़ाया गया.  
समय के साथ इनके जीवन में भी बदलाव आने लगा ,19 वीं सदी से पहले अनेक प्रकार के नियोग्यता के कारण पुत्री का जन्म हेय दृष्टी से देखा जाने लगा,धर्म के नाम पर सती प्रथा जैसी अमानवीय प्रथाए मानने के लिए बाध्य किया गया ,उन्हें बलि दिया जाने लगा इस प्रकार उनका अनेक प्रकार शोषण होने लगा जिससे उनकी स्थिति पुरुषो से निम्न हो गई महिलाओ को वेद का अध्ययन करने पर रोक लगा दिया गया और यह नियम बनाया गया की जो भी स्त्री वेदो का श्रवण करेगी उसको शुद्र के समान शीशा पिघलाकर उनके कानो में डाल दिया जायेगा इसके कारण कई रूढिया एवं कुरूतियों के कारण उनकी दशा गिरती गई | उन्हें केवल भोग विलास की बस्तु समझा जाने लगा
19वी शताब्दी में महिलाओ की स्थिति में सुधार होना प्रारंभ हुआ | इस शताब्दी में कई समाज सुधारको ने स्त्रियों की दयानिय दशा पर ध्यान दिया इस काल के बाद महिलाओ ने भी अपनी दशा के बिरुद्ध आवाज उठाई |
धीरे –धीरे बदलाव शुरू हो गया और वर्तमान में शिक्षा, शहरीकरण, एवं आधुनिकता के चलते महिलाये पुरुषो के समान सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, सभी क्षेत्रो में दायित्व को निभाते हुए पुरुषो के बराबर आ रही है |
इस सन्दर्भ में सनातन मात्री सेवा संस्थान के द्वारा सूरज कुमार पाण्डेय के नेतृत्व में महिलाओ के ऊपर  एक सर्वेक्षण का कार्य किया जिसमे आज भारतीय समाज में महिलाओ की वस्तुतः स्थिति कहा तक और किस हाल में है पहले कैसी थी तथा उसमे कब- कब और कितना परिवर्तन हुआ अर्थात भारतीय समाज में महिलाओ की क्या स्थिति है |
  इस सर्वे में 100 महिला उत्तर दाता का चयन किया गया बिभिन्न जातियां ,धर्म, संप्रदाय, शिक्षित, अशिक्षित, ग्रामीण, आयु, शहरी, विवाहित, अविवाहित महिलाओ जिसमे 15 वर्ष से 75 वर्ष तक आयु की युवतियां व महिलायें चुनी गई इसमे सबसे अधिक 15-25 वर्ष की महिला है जिसकी संख्या 30 है फिर 25-35 जिनकी संख्या 25 तथा 35 -45 वर्ष की महिला की संख्या 20 ,45-55 की संख्या 15, 55 -65 की संख्या 6 तथा 65 -75 की उम्र की महिला से सूचना प्राप्त की गई
वर्तमान समय में पुरुषो के साथ साथ महिलाये भी शिक्षा ग्रहण कर रही है | सरकार ने प्रौढ़ शिक्षा भी लागूं कर दी है नौकरी ब्यवसाय में भी महिलाये लगी हुई है, लेकिन पुरुषो से उनकी संख्या कम है पुरुष वर्ग जहा 75 %है वहा महिलाये 25 % है |
आधुनिक उपयोग की वस्तु के लिए यह निष्कर्ष निकला की आज के हर धनी ,सभ्य ,शिक्षित परिवारो में आधुनिक उपयोग की वस्तुए है इन उपयोग की वस्तुओ से स्पष्ट होता है की महिलाओ की स्थिति में पहले की अपेक्षा काफी परिवर्तन आया है|
विवाह तय होने के सन्दर्भ में यह निष्कर्ष निकला की विवाह परिवार में माता पिता तथा परिवार के वयोवृद्ध द्वारा ही तय किया जा रहा है जिनकी संख्या 100 में 48 %एवं 52 % है
           जीवन साथी चुनने के सन्दर्भ में 60 % महिलाये अपने माता पिता को ही ब्यक्तिगत प्रधानता देगी तथा 30 % महिला अपनी पसंद पर बल देती है 10% महिलाये मित्र दोस्तों की राय से शादी के लिए प्रधानता देती है |
महिलाओ की स्थिति में पहले की अपेक्षा काफी परिवर्तन दिखाई दे रहा है 95 % महिलाओ का कहना है की महिलाओ की स्थिति परिवर्तन हो रहा है 98 % महिला अपने स्थिति को और भी बेहतर बनाना चाहती है
             80 % महिलाओ का मत है की आज पुरुषो के सामान अधिकार प्राप्त है और 20 % महिलाओ का कहना है की पुरुषो के सामान अधिकार प्राप्त नहीं है
             पुनर्विवाह के बारे में 75 % महिलाओ को पसंद है पर 25 % महिलाओ को पसंद नहीं है पुनर्विवाह हिन्दू तथा मुसलिम धर्म एवं अशिक्षित महिला इसे पसंद नहीं करती
             98 % महिलाये अब बल विवाह को पसंद नहीं करती इनका कहना है की लडकियों को भी पुरुषो के भांति पढ़ा लिखा कर काबिल इंसान बना कर ही वो विवाह करनी चाहिए जिससे वो अपनी जिम्मेदारी समझ सके मात्र 2% महिला इसे पसंद करती है
            अंतर्जातिये विवाह को 78 % महिला पसंद नहीं करती है वो अपनी ही जाती में विवाह करना चाहती है लेकिन 22% महिला अन्तर्जातीय विवाह पसंद करती है
            विवाह से पहले अपने होने वाले जीवन साथी के सन्दर्भ में जानने के लिए 80% महिलाये जानना पसंद करती है उनका कहना है की विवाह के पूर्व अपने जीवन साथी के बारे में पूरी जानकारी जरुरी है लेकिन 20% महिला इसे जरुरी नहीं समझती
महिलाओ से जब पूछा गया की आप किस प्रकार का विवाह पसंद करती है तो 70 महिलाओ ने सामान्य विवाह को पसंद किया जबकि 30 % महिलाओ ने प्रेम विवाह को पसंद किया
95 % महिला दहेज़ नहीं देना चाहती है सती प्रथा में कोई भी महिला इसको पसंद नहीं करती बल्कि 100 % महिला इसका विरोध करती है पर्दा प्रथा में भी 80% महिला को पसंद नहीं है जबकि 20% महिला इसको पसंद करती है ये महिला अशिक्षित,ग्रामीण परिवेश की जिसकी उम्र 45 से ऊपर की है
  क्लब जाने के सवल पर अधिकांश महिला यानि 70 % महिला इसे पसंद नहीं करती जबकि 30% महिला इसे पसंद करती है
सहशिक्षा को अधिकांश महिला यानि 75 % महिला पसंद करती है इनका कहना है की पढ़ी लिखी महिला कहती है की ऊँची शिक्षा के लिए सह शिक्षा आवश्यक है हर जगह पर स्कुल कालेज महिलाओं के लिए अलग अलग खोलना असंभव है जबकि 25 % महिला सह शिक्षा को पसंद नहीं करती है उनका कहना है की समाज का रुख अब ख़राब हो गया है वातावरण इतना दूषित हो गया है की लड़कियों का लड़को के साथ एक ही स्कूल में पढ़ना ठीक नहीं है
   कठिन परिश्रम के द्वारा अपने भविष्य को सुधारने में 95 % महिला का मत है जबकि 5% इसको मानने से इंकार करती है
आत्मनिर्भर बनने के लिए 80 %महिलाओ का मत है जिसमे पढ़ी लिखी,शहरी महिला आत्म निर्भर बनना चाहती है
परिवार या बाहर पुरुष समाज  के द्वारा शोषण का सामना करना पड़ा है  के बारे में जानकारी ली गई तो 85%महिला ने इसे स्वीकार की है 
सरकार को महिलाओ की सामाजिक ,आर्थिक ,स्थिति को उन्नत करने के लिए क्या करना चाहिए,इस बारे में राय ली गई तो महिलाओ ने कहा की
शिक्षा का अधिक से अधिक प्रसार प्रचार होना चाहिए
गावं में कुटीर उद्योग खोला जाना चाहिए जिससे रोजगार के अवसर मिल सके
सरकार द्वारा पढ़ी लिखी महिलाओ को उनकी शिक्षा एवं योग्यता के आधार पर काम मिलना चाहिए
अनुसूचित एवं पिछड़ी जाती की तरह महिलाओ को हर क्षेत्र में आरक्षण का नियम लागु होना चाहिए
इन्ही प्रमुख उपयुक्त सुझाव एवं सरकारी प्रयासो के द्वारा महिलाओ की स्थिति में और ज्यादा बदलाव आएगा और वह विकास कर पायेगा
उपर्युक्त सभी आकड़ो को देखते हुए हम कह सकते है की इस पुरुष प्रधान देश में महिला भी पुरुषो के बराबर कदम से कदम मिला कर चल रही है तथा पहले के अपेक्षा महिलाओ के सोच में भी काफी परिवर्तन हुए है संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्ण कुमार पाण्डेय ने कहा की नारी में नारी सती है महान जिसके आगे झुके है भगवान अर्थात महिला वो शक्ति है जिसके आगे भगवान को भी झुकना पड़ता है और आज महिला को एक भोग बिलाश के बस्तु के तौर पर उपयोग कर फेक देना एक चिंता का बिषय है आज लोग गर्भ में ही यह जान कर गर्भपात कर देते है की इस कोख में पल रहा शिशु एक कन्या है आखिर कब तक हमारा समाज इस तरह की मानसिकता रख कर समाज निर्माण की कल्पना करता रहेगा दो से दुनिया होता है स्त्री और पुरुष जिसके घर्षण से एक शक्ति उत्त्पन्न होती है और वही शक्ति एक कुशल समाज का निर्माण करता है अगर कुशल समाज की कामना करना हो तो अपनी सोच को सकरात्मक रूप दे तभी दुनिया चल सकती है आज भी कुछ महिलाओ को जानकारी नहीं होने से दबी कुचली सी महशुस करती है हम यह भली भाती जानते है की संविधान ने महिलाओ को पुरुषो के बराबर अधिकार दिए है भारतीय संविधान के अनुछेद 14 के अनुसार यह कहा गया है की कानून के सामने स्त्री पुरुष दोनों का अधिकार बराबर है अनुच्छेद 15 के अनुसार महिलाओ की भेदभाव के विरुद्ध न्याय का अधिकार है संविधान द्वारा दिया गया अधिकार के अलावा भी समय समय पर महिलाओ की अस्मित्ता और मान सम्मान की रक्षाके लिए कानून बनाये गए है मगर क्या महिलाये अपने प्रति हो रहे अन्याय के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटा  पा रही है महिलाये अपने अधिकारों का सही इसतेमाल नहीं कर पाती है न्यायालय जाना तो दूर की बात है इसका सबसे बड़ी वजह की महिलाये अपने आप को पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं समझ रही है वह कानून की पेचीदा नियमो से बचना चाहती है कुछ महिला साहस भी करती है तो उसे कई तरह की परेसनियो का सामना करना पड़ता है उसके लिए कानून की पेचीदा गलियों में घूमना आसान नहीं होता दूसरा ,इसमे किसी का सहारा या समर्थन भी नही मिलता इसके कारन घर से लेकर बाहर  तक विरोध का सामना करना पड़ता है जिसका सामना अकेले करना उनके लिए कठिन होता है अगर कोई महिला हिम्मत कर के क़ानूनी करवाई के लिए आगे आती भी है तो थोड़े ही दिनों में क़ानूनी प्रक्रिया के जटिलता के कारण  उसका सारा उत्साह ख़त्म हो जाता है वह हार मान लेती है महिलाये लोक लाज के डर  से अपने दैहिक शोषण के मामले कम ही दर्ज करवाती है सम्पति के मामले में महिलाये भावनात्मक होकर सोचती है महिलाये अपने परिवार के खिलाफ भी जाना नहीं चाहती है इसलिए अपने अधिकारों के लिए दावा नहीं करती
इस नकारात्मक वातावरण का सामना करने के बजाये वे अन्याय सहते रहना बेहतर समझती है कानून होते हुए भी इसकी मदद नहीं ले पाती कारन चाहे आर्थिक हो या सामाजिक परिणाम हमारे सामने है आज भी हमारे देश में हजारो लडकिय दहेज़ केलिए जलाई जाती है रोज न जाने कितनी लडकियों को यौन शोषण के कारण शारीरिक एवं मानशिक शोषण से गुजरना पड़ता है कितनी ही महिलाये आपने सम्पति से बेदखल हो कर दर दर की ठोकरे खाने पर मजबूर है इसका सबसे बड़ा कारण अशिक्षा  जागरूकता एवं कानून की सही जानकारी न होना आज भी लगभग  54% महिला अशिक्षित है जिसमे जागरूकता का अभाव है जब तक महिलाये जागरूक नहीं होगी तब तक संविधान द्वारा बनाया गया महिलाओ के लिए कानून कारगर साबित नहीं होगा.    

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