रावण की उत्पत्ति

जै जै कुँज विहारी                                                                                                                    जै जै कुँज विहारी
(श्री राधा विजयते नमः)

रावण की उत्पत्ति का रहस्य

Date:- 12/09/2018
स्वामी श्री हरिदास राधेशनन्दन जू
एक  बार की बात है सनकादिक भगवान् विष्णु के दर्शन को बैकुंठ पहुचे तब भगवान् के नित्य पार्षद जय और विजय ने अज्ञानतावश सनकादिक को द्वार पर ही रोक दिया तब सनकादिक ने इस बात पर क्रुद्ध होकर जय विजय को श्राप दे दिया की जाओ तुम तीन जन्म के लिए राक्षस हो जाओ।

 इस तरह जब श्राप की बात भगवान् विष्णु ने सुनी तब तुरंत वे द्वार पर प्रकट हुए और सनकादिक से अपने पार्षदों के कृत्य के लिए क्षमा याचना की तक सनकादिक ने उन्हें क्षमा कर दिया और भगवान् से निवेदन किया की आप इनके उद्धार के लिए धरती पर अवतार ले और प्रभु ने इस निवेदन को स्वीकार कर लिया। इस तरह से कालान्तर में जय विजय ने तीन बार राक्षस रूप धारण किया जिसमे पहला हिरण्याक्ष और हिरण्य कश्यप दूसरा रावण और कुम्भकर्ण और तीसरा शिशुपाल और दन्तवक्त्र हुआ।
इनमे जो दूसरा जन्म रावण कुम्भकर्ण के रूप में हुआ उसकी चर्चा आज हम करने वाले है। ऋषि पुलत्स्य के वंश में विश्रवा पुत्र के रूप में रावण का जन्म एक उत्तम कोटि के ब्राह्मण परिवार में हुआ। रावण बचपन से ही बड़ा शिव भक्त था। उसने अल्प आयु में ही सारे वेद् शास्त्रो का ज्ञान प्राप्त कर लिया। रावण की पांडित्य का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है की जब भगवान् शंकर ने माता पार्वती के लिए सोने का महल बनवाया तब उसके पूजां के लिए आचार्य रूप में रावण का चयन किया और रावण ने दक्षिणा के रूप में उस सोने के महल को शिव जी से मांग लिया और सोने की लंका बसा ली। एक बार रावण ने संकल्प लिया की वो अपने इष्ट देव भगवान् शंकर को माता पार्वती सहित अपने सोने की लंका में स्थापित करेगा और वह इस प्रयोजन से कैलाश पर जा पंहुचा और कैलाश को माता पार्वती और शिव जी सहित उठाने लगा तब भगवान् शिव जी ने कैलाश को इतना भारी बना दिया की रावण उसके भार को नहीं उठा पाया। फिर रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना की और शिव जी की स्तुति करते हुए एक एक कर  अपने दसों शीश को धड़ से अलग कर शिव जी को अर्पित करने लगा तब शिव जी प्रसन्न हो कर उसे अपने ज्योति स्वरुप शिव लिंग प्रदान किया ।  एक बार उसने अपनी घोर तपश्या से ब्रह्म देव को प्रशन्न कर के वरदान माँगा की मनुष्य और वानर को छोड़ कर मै किसी अन्य के हाथो न मरू ब्रह्मा जी ने एवमस्तु कहकर आशीर्वाद दे दिया। फिर क्या था रावण ने पृथ्वी पर  हाहाकार मचा दिया और स्वर्ग पर आक्रमण करके सभी देवताओ को बंदी बना लिया।
 रावण के अत्याचार से पृथ्वी का भार बढ़ने लगा और वो एक गाय का रूप धारण कर समस्त देवताओ के साथ ब्रह्मा जी के पास पहुची और उस आतातायी रावण से पृथ्वी के भार को कम करने प्राथना करने लगी तब ब्रह्मा जी गौ रूप पृथ्वी और देवताओ को ले कर भगवान् विष्णु के पास गय और प्राथना करने लगे तब भगवान् ने पृथ्वी पर मनुष्य रूप में अवतार लेने का संकल्प किया और राज दशरथ और कौशल्या के घर पुत्र रूप में प्रकट हुए। जब श्री राम माता कैकई को दिए  गय अपने पिता के वचनो को निभाने के लिए वन में गय  और वह खर दूषण जो की रावण के भाई थे उनका वध कर दिया और रावण की बहन सुपनखा को लक्ष्मण जी ने अपमानित किया जिसका बदला लेने के लिए रावण ने छल से माता सीता का हरण कर लिया और माता सीता को लंका की ओर ले जाने लगा तब मार्ग में जटायु ने रावण का मार्ग रोक और दोनों में भयँकर युद्ध हुआ परंतु रावण ने जटायु को हरा कर माता सीता को लंका में स्थित अशोक वाटिका में में भयँकर राक्षसियों के बीच कैद कर दिया। उधर श्री राम सुग्रीव से मैत्री कर माता सीता की खोज में लग गय और श्री हनुमान जी की सहायता से लंका स्थित माता सीता की खोज किये, और समुद्र में सेतु बाँध कर लंका पर चढाई कर दिए। रावण ने युद्ध में एक एक करके अपने सभी पुत्र और भाई को भेज पर उन सभी को श्री राम लक्ष्मण और उनकी वानर और भालुओं की सेना ने मार गिराया। फिर जब अंत में रावण स्वयं युद्ध को आया तब उसने नाग पाश से श्री राम लक्ष्मण सहित सभी सेना को पाश में बांध लिया तब हनुमान जी ने गरुण का आहवाहन कर नागपाश से सब को मुक्त किया। फिर आगे युद्ध में  श्री राम चंद्र ने उसके दस शीश और बीस भुजाओ को काट कर उसके नाभि में स्थित अमृत कुण्ड को सोख दिया और रावण का वध कर दिया। अंत समय में श्री राम ने लक्ष्मण को नीति ज्ञान के लिए मरनाशन रावण के पास भेजा और मंदोदरी के शोक का निवारण किया। रावण के वध के उपरान्त भगवान् को ब्रह्म हत्या का पाप लगा जिसका उन्होंने प्रायश्चित भी किया। तब से असत्य पर सत्य की विजय का पर्व क्वार शुक्ल पक्ष दशमी को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है और रावण का सांकेतिक पुतला बना कर दहन किया जाता है। तो इस प्रकार से अपने पार्षद जय विजय के कल्याण के लिए भगवान् धरती पर लीला कर मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में एक आदर्श स्थापित किये।

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