पैदा होते ही अपशकुन (सनातन धर्म)

जै जै कुँज विहारी                                                                                                                    जै जै कुँज विहारी
(श्री राधा विजयते नमः)

जन्म के समय होते है तीन प्रकार के अप-शगुन!!

Date:- 10/09/2018
स्वामी श्री हरिदास राधेशनन्दन जू


हमारे इस संसार में हम समय समय पर शगुन-अपशगुन की बात करते है उदाहरण के लिए यदि कोई यात्री यात्रा पर निकल रहा हो तो तीन बातें अपशगुन मानी जाती है:-छींकना, रोना और टोकना। अर्थात हमारे यात्रा में निकलते समय यदि कोई छींक दे अथवा रो रहा हो अथवा कोई हमें टोक दे तो हम उसे अपशगुन मान लेते है और तुरंत कुछ न कुछ उसके निवारण का उपाय कर फिर अपनी यात्रा प्रारम्भ करते है।

जन्म के समय होने वाले तीन अपशगुन क्या है?

इसी प्रकार जब जीव अपनी जीवन यात्रा प्रारम्भ करते है तब भी यहि तीन प्रकार के अपशगुन होते है। बच्चा जब जन्म लेता है तब सबसे पहले छींकता है, फिर रोता है, और सगे-संबंधी क्या हुआ (अर्थात लड़का हुआ या लड़की) करके टोकते है।

इस जीवन का प्रारम्भ ही अपशगुन से होता है। 
जिस प्रकार अपशगुन हो जाय तो कोई न कोई निवारण कर हम अपनी यात्रा प्रारम्भ करते है उसी प्रकार जीवन यात्रा में भी जब जीव के जन्म लेते ही तीन प्रकार के अपशगुन एक साथ हो रहे है तब तो मामला गंभीर हो जाता है अतः हमें जन्म के समय भी होने वाले तीनो अपशगुनो का भी निवारण कर लेना चाहिए।

इस अपशगुन का परिणाम क्या होता है?
 इसका परिणाम यह होता है की जीव इस संसार के भवसागर में डूब जाता है और “मैं ते मोर तोर ते माया” तेरा-मेरा करते हुए माया के चक्कर में पड़ जाता है। इसके बाद उसके जीवन में काम क्रोध लोभ मोह आदि अनेक प्रकार की बीमारिया उसे घेर लेती है। माया का जाल इतना प्रबल हो जाता है की जीव अपने वास्तविक स्वरुप को भूल कर उस परमात्मा से विमुख हो जाता है और इस संसार को ही अपना जान कर इसमें सुख ढूंढने लगता है और दुःख को प्राप्त करता है। 

अपशगुन का निवारण कैसे होता है? 
जीव को चाहिए कि जैसे ही उसे बोध हो वह भगवान् की भक्ति प्रारम्भ कर दे और सभी अपशगुन का निवारण करे ताकि जीव इन अपशगुनो से होने वाली बीमारियो से बच सके और परमात्मा से अपना नित्य सम्बन्ध स्थापित कर उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। संसार अनित्य है, माया जनित है ऐसा जान कर जब जीव भगवान् के तरफ अभिमुख होता है तब भगवान् जीव को माया और माया जनित सभी विकारो से जीव की रक्षा करते है और जीव एक सार्थक जीवन व्यतीत कर अंत में भगवान् को प्राप्त कर लेता है ।।

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