देवी बनी दुर्गा (सनातन धर्म)

जै जै कुँज विहारी                                                                                                                    जै जै कुँज विहारी
(श्री राधा विजयते नमः)

जानिये कैसे देवी शक्ति इस जगत में “दुर्गा” नाम से विख्यात हुई!!


Date:- 10/09/2018
स्वामी श्री हरिदास राधेशनन्दन जू


दुर्गम को ब्रह्माजी का वरदान-  
श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार प्राचीन काल में दुर्गम नाम का एक दैत्य रहता था। दुर्गम हिरण्याक्ष के वंश में हुआ था जिसके पिता का नाम रूरू था। दुर्गम दैत्य ने यह सोच कर कि देवताओ का सारा तेज और शक्ति वेदों में निहित है उसने वेद को नष्ट करना चाहा। इस प्रयोजन की सिद्धि हेतु दुर्गम दैत्य ने हजारो वर्षो तक ब्रह्माजी की केवल वायु पी कर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न ब्रह्मा जी उसके सामने प्रकट हो गए और दुर्गम राक्षस से वर माँगने को कहा। दुर्गम ने ब्रह्मा से कहा की हे ब्रह्म देव आप मुझे सम्पूर्ण वेद प्रदान कीजिये और साथ ही ऐसा बल दीजिये कि मै सारे देवताओ को परास्त कर सकूँ। ब्रह्माजी ने एवमस्तु अर्थात ऐसा ही हो कहकर वरदान दिए और अपने लोक चले गए।

दुर्गम का अत्याचार-    ब्रह्माजी के वरदान देने के बाद ब्राह्मणों को सभी वेद विषमृत हो गए। स्नान, संध्या, नित्यहोम, श्रद्धा, यज्ञ, और जप आदि वैदिक क्रियाएँ नष्ट हो गई। सारे भूमण्डल में हाहाकार मच गया। देवताओ को जब यज्ञ का भाग मिलना बंद हो गया तो वे शक्तिहीन हो गए और जिन देवताओ को कभी बुढापा नहीं आता था वे बुढापे से ग्रसित हो गए। उचित समय जान कर उस वज्र के सामान देह वाले दुर्गम ने देवताओ की राजधानी अमरावती में आक्रमण कर दिया और सारे देवताओ को वहा से भगा कर अपना राज्य स्थापित कर लिया। 
अग्नि में हवन न होने के कारण वर्षा भी बंद हो गयी। वर्षा के आभाव में अकाल पड़ गया। धरती पर सारे जीव एक एक बून्द पानी के लिए तरसने लगे। कुँआ, तालाब, बावलियाँ, नदी  बिलकुल सुख गयी। धीरे धीरे धरती पर से जीवन समाप्त होने लगा। इस प्रकार यह अनावृष्टि सौ वर्षो तक चली।
देवताओ द्वार देवी कि स्तुति- फिर सारे देवता और ब्राह्मण मिलकर हिमालय के शिखर में पहुचे और एक साथ देवी भगवती की स्तुति प्रारम्भ की। जब देवताओ ने पूर्ण शरणागति माता भगवती के चरणों में की तब माता भगवती को उनकी इस अवस्था में दया आ गयी और माता भगवती जो ‘भुवनेशी’ एवं ‘महेश्वरी’ नाम से विख्यात है, अपने दिव्य रूप के दर्शन कराये। 

देवी के नयनो से अश्रु वृष्टि–  माता भगवती का वह विग्रह अनन्त आँखों से संपन्न था। आँखे ऐसी मानो नीलकमल हो। कंधे ऊपर की ओर उठे हुए थे। विशाल वक्ष थे। हांथो में बाण, कमल के पुष्प, पल्लव और मूल सुशोभित थे। जिनसे भूख प्यास और बुढापा दूर हो जाता है, ऐसे शाक आदि खाद्य पदार्थो को उन्होंने हाथ में धारण कर रखा था। करोडो समुद्रो के सामान चमकाने वाला भगवती का वह विग्रह करुणा-रस का अथाह समुद्र था। 
इस प्रकार की दिव्य झांकी उपस्थित करने के बाद जगत की रक्षा में तत्पर रहने वाली करुणा ह्रदय वाली माता भगवती ने जगत की रक्षा के लिए अपने उन सहस्त्र नेत्रो से जलधाराएँ गिराना प्रारम्भ की। उनके नेत्रो से निकले जलधाराओं से त्रिलोकी पर नव दिनों तक महान वृष्टि होती रही। सम्पूर्ण जगत के प्राणियो के दुःख से दुखी होकर भगवती के आँखों से आंसू जल रूप में गिरा था। जल पाने के बाद सभी प्राणियो की तृप्ति हुई। 

शताक्षी  ब्राह्मणों और देवताओं ने भगवती की विविध प्रकार से स्तुति की और देवी को नमस्कार करते हुए कहा कि हे माता आपने हमारे दुःख दूर करने के लिए सहस्त्र नेत्रो से संपन्न अनुपम रूप धारण किया है अतएव आज से आप का एक नाम “शताक्षी”  होगा।

शाकम्भरी ब्राह्मणों और देवताओ के इस प्रकार के वचनो को सुनने के बाद देवी ने अनेक प्रकार के शाक तथा स्वादिष्ट फल अपने हाथो से उन्हें खाने के लिए दिए। भाँति भाँति के अन्न उनके सामने उपस्थित किये। पशुओ के खाने के लिए कोमल और रसो से संपन्न नवीन तृण प्रकट किये और उसी दिन भगवती का एक नाम “शाकम्भरी” पड़ा। 

देवी और दुर्गम का युद्ध-   देवी की इस महिमा का पता जब दुर्गम दैत्य को चला तब वह अपनी सेना सजा कर देवी से युद्ध करने निकल गया। दुर्गम अनेक प्रकार के अस्त्र शास्त्रो से सुसज्जित हो कर एक अक्षोहिणी सेना ले कर युद्ध करने गया। दुर्गम दैत्य ने समस्त देवताओ सहित देवी को घेर लिया। देवता रक्षा करो रक्षा करो करके पुकारने लगे। तब देवी ने देवताओ की रक्षा के लिये एक तेजोमय चक्र प्रकट किया। फिर देवी और दैत्यों के बीच युद्ध आरम्भ हो गया।
युद्ध के समय देवी ने अपने श्रीविग्रह से बहुत सी उग्र शक्तिया प्रकट की। सबसे पहले देवी ने बत्तीस शक्तिया प्रकट की फिर चौसठ और अंत में सहस्त्र शक्तिया प्रकट की। सम्पूर्ण देवियां अनेको आयुधों से संपन्न थी। पूरा युद्ध स्थल मृदंग, शंख , और दुन्दुभियो की आवाज से गुंजायमान हो रहा था। उन सभी देवियो ने दुर्गम के आधे से अधिक सेना का संघार कर दिया। इस प्रकार दस दिनों के भीतर दुर्गम के सारी  सेना का लगभग विनाश हो गया। तब ग्यारहवे दिन दुर्गम स्वयं युद्ध करने को तत्पर हुआ।

देवी द्वारा दुर्गम का वध- दुर्गम ने अत्यंत भयानक रूप धारण कर उन शक्तियो पर आक्रमण बोल दिया और शक्तियो पर विजय प्राप्त कर लिया। इसके बाद वह अपने रथ को देवी के सम्मुख ले जा कर खड़ा कर दिया और देवी तथा दुर्गम में भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया। हृदयांकित करने वाला वह युद्ध दोपहर तक होता रहा फिर देवी ने दुर्गम पर एक साथ पंद्रह बाण छोड़े। चार बाण चारो घोड़ो को लगे एक सारथि को लगा। देवी के दो बाण दुर्गम के दोनों नेत्रो को तथा दो बाण दोनों भुजाओ को भेद गया। एक बाण ध्वजा को काट दिया। और देवी के पांच बाण दुर्गम के छाती का भेदन कर दिए। फिर तो रुधिर बमन करता हुआ वह दैत्य दुर्गम ने अपने प्राण ही त्याग दिए। उसके शरीर से एक तेज निकला और भगवती के रूप में जा कर समा गया। उस दैत्य के मारे जाने पर सम्पूर्ण त्रिलोकी का शोक दूर हुआ और ब्रह्मा, विष्णु और महेश की अगुवाई में सारे देवी देवता और ब्राह्मण देवी की स्तुति गान करने लगे और दुर्गम दैत्य का संघार करने के कारण देवी को “दुर्गा” नाम से स्तुति की। 

इस प्रकार माता भगवती ने शताक्षी और शाकम्भरी नाम से जहा त्रिलोकी में जल और भोजन की कमी को पूर्ण किया वही दुर्गा के रूप में उस दुर्गम नाम के दैत्य का संघार किया। 
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